भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के देशभक्त क्रांतिकारी शहीद महावीर सिंह
संदीप गोयल/एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। महावीर सिंह राठौर 1930 के दशक के एक भारतीय क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे। सिंह नौजवान भारत सभा के सदस्य थे। उन्होंने लाहौर के मोज़ांग हाउस से भगत सिंह , बटुकेश्वर दत्त और दुर्गावती देवी को भागने में मदद की। उन्हें द्वितीय लाहौर षड्यंत्र कांड के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया था और उन्होंने मोहित मोइत्रा ( शस्त्र अधिनियम मामले में दोषी), मोहन किशोर नामदास (शस्त्र अधिनियम मामले में दोषी) और 30 अन्य लोगों के साथ कैदियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार के विरोध में 1933 की भूख हड़ताल में भाग लिया था। सिंह की मृत्यु 17 मई 1933 को जबरन भोजन कराए जाने के कारण हुई। मोहित मोइत्रा और मोहन किशोर नामदास की भी भूख हड़ताल के दौरान मृत्यु हो गई। उनके सम्मान में सेलुलर जेल के सामने एक प्रतिमा स्थापित की गई थी।
शहीद महावीर सिंह राठौड़ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान क्रांतिकारी और अमर सेनानी थे, जिन्होंने अंडमान की सेलुलर जेल में अमानवीय अत्याचारों के खिलाफ भूख हड़ताल करते हुए 17 मई 1933 को अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्होंने कानपुर के डी.ए.वी. कॉलेज में पढ़ाई की। यहीं पर उनका संपर्क चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों से हुआ। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन और नौजवान भारत सभा के सक्रिय सदस्य थे। उन्होंने भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और दुर्गावती देवी को लाहौर के मोज़ांग हाउस से सुरक्षित बाहर निकलने और फरार होने में मदद की थी। अंग्रेजों ने उन्हें द्वितीय लाहौर षड्यंत्र मामले के तहत गिरफ्तार किया और उम्रकैद (काला पानी) की सजा देकर अंडमान की सेलुलर जेल भेज दिया। वर्ष 1933 में सेलुलर जेल में कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में महावीर सिंह अपने 30 से अधिक साथियों के साथ भूख हड़ताल पर बैठे। अंग्रेजों ने जबरन उनके मुंह और नाक में दूध डालने (फोर्स फीडिंग) का क्रूर प्रयास किया, जिससे दूध उनके फेफड़ों में चला गया और 17 मई 1933 को उनकी मृत्यु हो गई।
महावीर सिंह का जन्म 16 सितंबर 1904 में एटा जिले (उत्तर प्रदेश) के शाहपुर टहला गाँव में हुआ था। उनके पिता कुंवर देवी सिंह एक जाने माने अच्छे वैद्य और माता शारदा देवी एक धर्मपरायण महिला थीं। महावीर सिंह बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों के थे। कानपुर के डीएवी कालेज में पढ़ाई के दौरान वे क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए। उन्होंने भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और दुर्गा भाभी को लाहौर के मौजांग हाउस से तीनों क्रांतिकारियों को सुरक्षित निकालने में मदद की। वे नौजवान भारत सभा के सदस्य थे और बाद में चंद्रशेखर आज़ाद के संपर्क में आने के बाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गए। 1930 में उन्हें दुसरे लाहौर षड्यंत्र केस के तहत गिरफ़्तार कर लाहौर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। जेल में भी उनका विद्रोह जारी रहा। क़ैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार के खिलाफ भगत सिंह और जतिन दास के साथ मिलकर ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। 63 दिन की भूख हड़ताल ने अंग्रेज़ी हुकूमत को हिला दिया। लाहौर सेंट्रल जेल से उन्हें आजीवन कारावास के लिए अंडमान कीं सेल्यूलर जेल में भेजा गया था, जो अपनी क्रूर यातनाओं के लिए जानी जाती थी। अंडमान सेलुलर जेल में क्रांतिकारियों। स्वतंत्रता सेनानियों और राजनीतिक क़ैदियों के साथ किए जा रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में उन्होंने 1933 को भूख हड़ताल में भाग लिया था। 17 मई 1933 को अंग्रेज़ों ने उन्हें बलपूर्वक खाना खिलाने का प्रयास किया, जिसके कारण एक नली उनके फेफड़ों में चली गई और मात्र 28 वर्ष की आयु में सेल्युलर जेल, अंडमान में उन्होंने प्राण त्याग दिए। अंग्रेज़ों ने डर के मारे उनका शव भी परिवार को नहीं सौंपा, समुद्र में फेंक दिया। महावीर सिंह का बलिदान हमें देशभक्ति की भावना से प्रेरित करता है और हमें अपने देश और समाज के लिए कुछ करें अपने अधिकारों के लिए लड़े।
स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में जिले के पटियाली तहसील क्षेत्र के गांव शाहपुर टहला में जन्मे शहीद महावीर सिंह राठौर का नाम सम्मान के साथ याद किया जाता है। बालपन से ही कुछ कर गुजरने की इच्छा ने उन्हें महान बलिदानी बना दिया। शहीद भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव के साथ उन्होंने क्रांति की पटकथा में कई अध्याय जोड़े। दिल्ली असेंबली में बम फेंकने एवं अंग्रेज अफसर सांडर्स के हत्या में भी शामिल रहे। महावीर सिंह किशोर उम्र से ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने लगे। हमउम्र बच्चों की टोलियां बनाकर अमन सभा आयोजित कर ब्रिटिश अफसरों के सामने अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में नारे लगाए और महात्मा गांधी के समर्थन में नारेबाजी की। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें विद्रोही घोषित कर दिया। इससे महावीर सिंह के मन में धधकी आजादी की ज्वाला और भड़क उठी। इंटरमीडिएट की शिक्षा के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए कानपुर डीएवी कॉलेज में पहुंचे। जहां चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में आए और उनकी सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन के सदस्य बन गए। यहीं उनका परिचय भगत सिंह से हुआ। 1929 में दिल्ली की असेंबली में बम फेंका गया और अंग्रेज अफसर सांडर्स की हत्या की गई। इन दोनों ही मामलों में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त एवं महावीर सिंह को गिरफ्तार किया गया। मुकदमे की सुनवाई लाहौर में हुई। महावीर सिंह को भगत सिंह का सहयोग करने में आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी। उन्हें पंजाब व तमिलनाडु की जेलों में रखा गया। 1933 में उन्हें अंडमान की सेल्यूलर जेल भेज दिया गया। क्रांतिकारियों के साथ अंडमान की जेल में महावीर सिंह ने भूख हड़ताल की। अंग्रेजों ने भूख हड़ताल तुड़वाने के लिए उनके मुंह में जबरन दूध डाला जो उनके फेफड़ों में चला गया और उनकी मौत हो गई। अंग्रेजों ने उनका शव पत्थरों से बांधकर समुद्र में प्रवाहित कर दिया। 1904 में जन्मे महावीर सिंह 29 वर्ष की अल्पायु में ही दुनिया से विदा ले गए। अमर बलिदानी महावीर सिंह राठौर की स्मृति में देश के कई हिस्सों में उनकी प्रतिमाएं लगी हुई हैं। गांव शाहपुर टहला और पटियाली में तो उनकी प्रतिमा स्थापित है ही अंडमान की सेल्यूलर जेल में भी प्रतिमा स्थापित है।
