बिंदाल-रिस्पना और आशारोडी-मियांवाला एलिबेटेड रोड के खिलाफ सीपीएम का ज्ञापन

एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस

देहरादून 22 अक्टूबर। प्रस्तावित बिंदाल-रिस्पना तथा आशारोडी-मियांवाला एलिबेटेड रोड परियोजनाओं के कारण हो रहे भारी विस्थापन और पर्यावरणीय खतरों के विरोध में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम के प्रतिनिधिमंडल ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव महोदय को ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन में इन परियोजनाओं को तत्काल निरस्त करने और वैकल्पिक व्यवस्था विकसित करने की मांग की गई है। ज्ञापन सौंपते हुए सीपीएम (एम) एवं संयोजक और ‘बचाओ आंदोलन’ से जुड़े प्रतिनिधियों ने कहा कि एलिबेटेड रोड परियोजनाओं के चलते शहर के हजारों निवासियों के आशियाने, आजीविका और पर्यावरण पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। जनहित में इन परियोजनाओं को रद्द करने की मांग को लेकर जन आंदोलन चलाया जा रहा है। मुख्य सचिव महोदय ने आंदोलनकारियों की बात सुनने के बाद आवश्यक कार्यवाही का आश्वासन दिया है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि रिस्पना-बिंदाल परियोजना के लिए लगभग 88 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है, जिससे हजारों परिवार प्रभावित होंगे। दशकों से नदी किनारे बसे 10,000 से अधिक प्रभावित परिवारों को अब तक अधिसूचना के दायरे में नहीं लिया गया है, जबकि सरकार ने केवल 372 पंजीकृत धारकों को नोटिस जारी किया है। आशारोडी-मियांवाला मार्ग पर 400 से अधिक घरों पर उजड़ने का खतरा है।परियोजनाओं के संबंध में आयोजित जनसुनवाई को अत्यंत दोषपूर्ण बताया गया। आरोप लगाया गया कि उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद नियमों का पालन नहीं किया गया, सूचना कम समय में जारी की गई और वीडियोग्राफी नहीं की गई। आपत्ति उठाने वाले नागरिकों को धमकाया भी गया। देहरादून भूकंपीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र (MBT और HFT के बीच) में स्थित है। नदियों के तल में मौजूद ढीली रेत और बजरी के कारण एलिबेटेड स्तंभों की स्थिरता पर सीधा खतरा है। इसके अलावा, नदी तल पर निर्माण से प्राकृतिक जल प्रवाह बाधित होगा और बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा। हजारों पेड़ों की कटाई से भूजल पुनर्भरण भी प्रभावित होगा। सीपीएम ने सरकार से मांग की है कि महंगी और विनाशकारी एलिबेटेड रोड परियोजनाओं के स्थान पर आंतरिक सड़कों और पुलों के सुधार पर ध्यान केंद्रित किया जाए। पब्लिक ट्रांसपोर्ट (इलेक्ट्रिक बसों) को मजबूत किया जाए और पैदल-अनुकूल क्षेत्रों का विकास किया जाए, जिससे बिना किसी विस्थापन के यातायात सुधार हो सके।

सीपीएम ने चेतावनी दी है कि यह आंदोलन केवल एक विरोध नहीं, बल्कि जनभावनाओं का स्पष्ट प्रतिबिंब है। यदि सरकार ने समय रहते जनहित में फैसला वापस नहीं लिया, तो सामाजिक अशांति को भी जन्म मिल सकता है। राज्य सरकार से इस मामले में पूर्ण पारदर्शिता बरतने की अपेक्षा की जा रही है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *