दिन-प्रतिदिन लगने वाला जाम कर रहा आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित : अनंत आकाश
एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून उत्तराखंड की राजधानी है और यहीं यातायात निदेशालय भी स्थित है। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि राजधानी की सड़कों पर यातायात व्यवस्था अन्य शहरों के लिए मॉडल बने। लेकिन वर्तमान स्थिति इसके विपरीत है। शहर के प्रमुख मार्गों पर दिन-प्रतिदिन लगने वाला जाम आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। यातायात विभाग की कार्यशैली में सड़कों को सुचारू करने की प्राथमिकता के बजाय चालानी कार्रवाई और राजस्व वसूली पर अधिक जोर दिखाई दे रहा है। यही नहीं, यातायात डायवर्जन को ही समाधान मान लेना भी समस्या को और जटिल बना सकता है। असली जरूरत डायवर्जन के बजाय मौजूदा यातायात का सुचारू एवं व्यवस्थित संचालन है।
राजधानी के यातायात की बदतर हालत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राजपुर रोड, घंटाघर, गांधी रोड, सहारनपुर चौक, कांवली रोड, पुरुषोत्तम पान भंडार चौक, बिंदाल पुल, गोबिंदगढ़ तिराहा, बल्लीवाला चौक और चकरोता रोड जैसे इलाकों में लगातार घंटों जाम लग रहा है। त्योहारों, शादियों और व्यस्त कार्यदिवसों में स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब प्रमुख चौराहों पर वाहनों की लंबी कतारें लग जाती हैं। इस जाम का असर सिर्फ लोगों के समय की बर्बादी तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार, बेकाबू ट्रैफिक जाम के कारण ईंधन की बर्बादी लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है और प्रतिदिन करीब 60,000 लीटर पेट्रोल व्यर्थ जल रहा है। सबसे चिंताजनक स्थिति तब देखने को मिलती है जब जाम में फंसी एंबुलेंस मरीजों को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचा पाती और मरीज की जान खतरे में पड़ जाती है। ऐसे में यह सिर्फ यातायात की समस्या नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और आपातकालीन सेवाओं का संकट है।
यातायात पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठना स्वाभाविक है, क्योंकि विभाग की ओर से लगातार बड़े पैमाने पर चालान काटे जा रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य परिवहन विभाग ने 8,38,391 चालान जारी कर 62.22 करोड़ रुपये का राजस्व वसूला है। इसी तरह, देहरादून में सिर्फ चार महीनों जनवरी से अप्रैल के बीच लगभग 79,800 चालान काटे गए और साढ़े तीन करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना वसूला गया।
यह स्थिति स्पष्ट करती है कि प्रशासन का फोकस नियम तोड़ने वालों से जुर्माना वसूलने पर अधिक है, जबकि जाम की मूल समस्या का स्थायी समाधान नहीं खोजा जा रहा। यातायात निदेशालय के देहरादून में होने के बावजूद शहर की सड़कों पर कोई समुचित योजना या दीर्घकालिक ट्रैफिक प्लान जमीन पर लागू होते नहीं दिख रहा। चालान यातायात अनुशासन का एक साधन हो सकता है, लेकिन समाधान नहीं। समाधान है—चौराहों का वैज्ञानिक प्रबंधन, सिग्नल समय में सुधार, अवैध पार्किंग और अतिक्रमण पर रोक, लेन अनुशासन, त्वरित दुर्घटना निस्तारण और आपातकालीन वाहनों के लिए सुनिश्चित रास्ता।
इस मुद्दे पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने पहले भी पुलिस अधीक्षक (यातायात) को पत्र लिखकर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की थी, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। सीपीएम ने एलिवेटेड रोड के विरोध में भी मुख्य सचिव को ज्ञापन सौंपते हुए वैकल्पिक यातायात व्यवस्था विकसित करने की मांग की थी। इससे साफ है कि स्थानीय संगठनों और जनप्रतिनिधियों की चिंता के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए गए।
लेकिन यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यातायात डायवर्जन कोई स्थायी समाधान नहीं है। डायवर्जन से एक सड़क का बोझ दूसरी सड़क पर स्थानांतरित हो जाता है और कई बार जाम और भी फैल जाता है। इसलिए यातायात पुलिस और उच्चाधिकारियों को डायवर्जन के बजाय सुचारू एवं व्यवस्थित संचालन पर ध्यान देना चाहिए। इसका अर्थ है-मौजूदा सड़कों, चौराहों और पार्किंग स्थलों का अधिकतम और अनुशासित उपयोग, ताकि वाहनों की आवाजाही बिना अनावश्यक रुकावट के हो सके।
देहरादून की यातायात व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सिर्फ चालान काटना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए एक समग्र, व्यवहारिक और तत्काल योजना की जरूरत है, जिसमें शामिल हो:
स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम और आवश्यकतानुसार वन-वे व्यवस्था लागू करना, लेकिन पहले मौजूदा ट्रैफिक फ्लो का वैज्ञानिक अध्ययन करना।
प्रमुख चौराहों पर ट्रैफिक इंजीनियरों की तैनाती और सिग्नल समय में व्यस्तता के अनुसार बदलाव।
अवैध पार्किंग, अतिक्रमण और गलत दिशा में वाहन चलाने पर सख्त और निरंतर कार्रवाई।
सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना और प्रमुख बाजारों के पास व्यवस्थित पार्किंग विकसित करना।
राजपुर रोड, घंटाघर, सहारनपुर चौक, बिंदाल पुल और चकरोता रोड जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए अलग-अलग यातायात प्रबंधन योजना बनाना।
स्कूल, कॉलेज और कार्यालयों के समय में समन्वय करके पीक-आवर ट्रैफिक को संतुलित करना।
एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पुलिस वाहनों के लिए आपातकालीन कॉरिडोर सुनिश्चित करना।
यातायात पुलिस की जवाबदेही तय करना और जाम संबंधी शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई।
यदि प्रशासन जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाता, तो यह जाम शहर की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और नागरिकों के स्वास्थ्य पर और भी बुरा असर डालेगा। राजधानी में यातायात निदेशालय होने के बावजूद सड़कों पर लगने वाला जाम प्रशासनिक विफलता का सीधा प्रमाण है। अब जरूरत इस बात की है कि यातायात पुलिस और उच्चाधिकारी सिर्फ चालान और डायवर्जन तक सीमित न रहें, बल्कि सड़कों पर सुचारू, व्यवस्थित और संवेदनशील यातायात संचालन को अपनी प्राथमिकता बनाएं। तभी राजधानी की सड़कों पर लगने वाला जाम कम हो सकता है और नागरिकों को राहत मिल सकती है।
