स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नीलाम्बर दत्त पन्त ने देहरादून में किया था बाल सेना का गठन

एस.के.एम. न्यूज सर्विस

देहरादून। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री नीलाम्बर दत्त पन्त का मूल पैतृक गाँव स्यूनरा कोट, विकास खण्ड हवाल बाग, अल्मोड़ा उत्तराखण्ड है। श्री पन्त जी के दादा श्री गोपाल दत्त पन्त जो कि आयुर्वेद के ज्ञाता एवं संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे, लगभग 1882 में देहरादून स्थित गुरु राम राय दरबार साहिब के तत्कालीन महन्त श्री प्रयाग दास जी के आग्रह पर दरबार में उनके व्यक्तिगत फिजिशियन होने के साथ ही प्रतिष्ठित मिशन स्कूल में संस्कृत का अध्यापन करते हुए दून में ही बस गये।

स्वतंत्रता सेनानी श्री नीलाम्बर दत्त पन्त का जन्म 23 सितम्बर 1923 को देहरादून में ही हुआ। श्री पन्त के पिता गुरुदत्त पन्त ने लाहौर विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक डिग्री प्राप्त कर रायल वन अनुसंधान संस्थान (वर्तमान में वन अनुसंधान संस्थान) देहरादून में एण्टोमोलॉजिस्ट (कीट रोग विशेषज्ञ) पद पर कार्य करना प्रारम्भ किया। श्री पन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कला वर्ग में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। श्री पन्त के अग्रज भ्राता श्री मुरारी दत्त पन्त ने भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वाणिज्य वर्ग में स्नातक किया। आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय में महान स्वतंत्रता सेनानी एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हिमालय पुत्र श्री हेमवती नन्दन बहुगुणा एवं श्री गुरु राम राय दरबार साहिब के महन्त एवं स्वतंत्रता सेनानी ब्रह्मलीन महन्त इन्द्रेश चरण दास जी के सहपाठी रहे और रक्षा लेखा नियंत्रक (सी.डी.ए.) भारत सरकार में अकाउन्टेन्ट के पद पर कार्य किया।पन्त की एक मात्र बहन श्रीमती हरिप्रिया पाण्डे का विवाह नैनीताल जिले के प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री बद्रीदत्त पाण्डे जी के साथ हुआ। श्री पन्त को परिवार में बचपन से ही स्वतंत्रता संघर्षों की सीख मिली। विदित हो कि स्यूनरा कोट गाँव श्री सुमित्रानन्दन पन्त का पैतृक गाँव है और हिन्दी भाषा के प्रथम ज्ञानपीठ श्री पन्त ने स्वतंत्रता आन्दोलन पर भी कई कविताओं की रचना की। उनके छोटे भाई श्री देवीदत्त पन्त (दुड़किया वकील) स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ अल्मोड़ा संसदीय सीट से 1952 के प्रथम सांसद भी रहे। श्री पन्त के दादा और परदादा स्वतंत्रता आन्दोलन से प्रभावित थे। इस कारण श्री पन्त ने बाल सेना का भी गठन किया और उसमें काफी सक्रिय रहे। वैश्विक आजादी के संघर्षों से प्रभावित श्री पन्त के स्कूल बैग में (मिशन स्कूल में 9वीं कक्षा में पढ़ते समय) कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो की किताबें एवं तिरंगा झण्डा मिलने पर पूरे दिन धूप में खड़ा होने की सजा दी गई। किन्तु आजादी के दीवाने यह नवयुवक अगले दिन फिर अपने साथ बैग में तिरंगा झण्डा लेकर स्कूल पहुँच गया। तब सजा के तौर पर 10 बेंत मारकर स्कूल से निकालने की चेतावनी देकर घर भेज दिया गया। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान पन्त जी ने दो बार दो-दो माह की जेल यातना भोगी। जेल में दी गई कठोर यातनाओं के किस्से जब हम उनसे बचपन में सुनते तो जान क्यों हमारी रगों में दौड़ता हुआ लहू भी गर्म हो जाता था।

आजादी के पश्चात देहरादून नगरपालिका बोर्ड के प्रथम चुनाव 1953 में श्री पन्त ने भारी बहुमत से सभासद पद पर विजय प्राप्त की व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व दरबार साहिब के तत्कालीन महन्त श्री इन्द्रेश चरण दास जी की अध्यक्षता में नगरपालिका क्षेत्र में विकास कार्यों को गति दी।श्री पन्त आजीवन समाज सेवा का कार्य करते रहे। आप लम्बे समय तक देहरादून स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संगठन के महासचिव रहे। श्री पन्त उत्तराखण्ड शोध संस्थान के संस्थापक सदस्य भी रहे। आजादी के आदर्शों पर निरन्तर चलते हुए उन्होंने आजीवन पेंशन नहीं ली व किसी भी प्रकार की अन्य सरकारी सहायता का लाभ भी नहीं लिया। श्री पन्त की मृत्यु 13 सितम्बर 1996 को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी के कारण देहरादून में हुई। उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी पत्नी श्रीमती तारा पन्त ने भी पेंशन लेने से इंकार किया। वर्तमान में भी श्री पन्त के परिजनों द्वारा भी उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रदत्त कुटुम्ब पेंशन नहीं ली जा रही है। श्री पन्त के दोनों पुत्र आज समाज सेवा में निरन्तर लगे हैं। आपके बड़े पुत्र अवधेश पन्त राष्ट्रीय स्तर पर सेनानी परिवारों के हित में लगातार कार्यरत हैं और देश के दो करोड़ स्वतंत्रता सेनानी परिवारों को एकजुट कर महान सेनानियों के सम्मान की रक्षा हेतु विभिन्न प्रदेशों में जाकर संगठन की एकता के लिये प्रयासरत हैं।

 

 

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