August 17, 2026

देहरादून। सन 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में उत्तर प्रदेश के बड़ौत क्षेत्र से जुड़ी शिवदेवी तोमर (16 वर्ष) और उनकी छोटी बहन जयदेवी तोमर (14 वर्ष) ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ अदम्य साहस का परिचय दिया था। इन दोनों बालिकाओं ने अंग्रेजी हुकूमत के दमन के खिलाफ हथियार उठाए और देश के लिए अपना बलिदान दिया। सन 1857 की क्रान्ति में बडौत निवासी 16 वर्षीय वीरांगना शिवदेवी तोमर और उनकी 14 वर्षीय छोटी बहन वीर बालिका क्षत्राणी जयदेवी तोमर ने अंग्रेजो से मुकाबला किया। शिवदेवी को धोखे से अंग्रेजो ने शहीद कर दिया था। शिवदेवी के साथ किये अंग्रेजी अत्याचार को जयदेवी ने अपनी आँखों से देखा था। जयदेवी ने बिजरोल गाँव में अंग्रेजों द्वारा फांसी पर लटकाए हुये क्रांतिकारियों के शवों को भी देखा, क्रांतिकारियों के छलनी किए शरीरों का देखकर जयदेवी ने भारतीयों पर हुए इस अत्याचार का बदला अंग्रेजो से लेने का कठोर प्रण किया। जय देवी ने बड़ौत वासियों को कहा कि मेरी बहन के प्रति सच्ची श्रद्धाजलि यह है कि हम आजादी के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देते रहें। जयदेवी ने प्रण किया कि जिस अंग्रेज़ ने उसकी बहन तथा वीरों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया था उसका बदला अवश्य लूँगी। वीर बालिका जयदेवी अंग्रेजों के रिसाले का पीछा करती रहती तथा गावों में घूम-घूम कर युवक-युवतियों में जोश पैदा करती। जयदेवी के साथ लगभग 200 क्रांतिकारियों का जत्था चलता था। इसने अग्रेज़ रिसाले का लखनऊ तक पीछा किया लेकिन अंग्रेजों को जयदेवी की खबर तक नहीं लगी। इस वीर बालिका ने मेरठ, बुलंदशहर, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, इटावा आदि जिलों में भी क्रांति की अलख जगाई। लखनऊ में जयदेवी ने अपने क्रांतिकारी दस्ते द्वारा बड़ौत में अत्याचार करने वाले अंग्रेज़ अधिकारी के बंगले की खोज करवाली। कई दिनों तक अंग्रेज़ अधिकारी को मारने का प्रयास होता रहा। लखनऊ में उन्हें छिपकर रहने और खाने की भारी परेशानी हुई, लेकिन एक दिन बंगले में टहलते हुये अंग्रेज़ अफसर का सिर जयदेवी ने तलवार से उड़ा दिया। उसके अनुयायियों ने अंग्रेज़ सैनिकों को मार गिराया और बंगले को आग लगा दी। क्रांतिकारी अंग्रेजों से झुंझकर जुझार हो गए। कपड़ों पर लगे खून से अंग्रेज़ जयदेवी को पहचान कर पाये और उसकी देह को लखनऊ में पेड़ से लटका दिया गया। अंग्रेजों के भयंकर आतंक के बावजूद क्रांतिकारियों ने उनकी लाश को दफनाकर उस पर चबूतरा बनवा दिया। यह चबूतरा विधानसभा की दूरदर्शन वाली सड़क पर है। यहाँ देशभक्त आज भी सिर झुका कर श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं। बूढ़े लोग आज भी जयदेवी की लोक-कथा सुनाकर बलिकाओं में वीरता का संचार करते हैं। ऐसी महान वीरांगनाओं की गाथा आज बच्चों को सुनकर उन्हें देश धर्म के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए।

वीरांगना शिवदेवी तोमर

बड़ौत में अंग्रेजी सेना के दमन के दौरान 16 वर्षीय शिवदेवी ने डटकर मुकाबला किया।

घायल अवस्था में जब उनका उपचार चल रहा था, तब अंग्रेजी फौज ने अचानक हमला कर दिया।

इसी दौरान वे वीरगति को प्राप्त हुईं और कम उम्र में देश के लिए शहीद होने वाली चुनिंदा बालिकाओं में शामिल हुईं।

वीरांगना जयदेवी तोमर

शिवदेवी की छोटी बहन जयदेवी (उम्र लगभग 14 वर्ष) ने अपनी आँखों से बहन का बलिदान देखा।

उन्होंने अपनी बहन की शहादत का बदला लेने और अंग्रेजों को खदेड़ने का दृढ़ संकल्प लिया।

जयदेवी ने गाँवों में घूम-घूमकर युवाओं और युवतियों को संगठित किया तथा करीब 200 क्रांतिकारियों का जत्था तैयार किया।

उन्होंने मेरठ, अलीगढ़, बुलंदशहर से लेकर लखनऊ तक अंग्रेजी सेना का पीछा किया और क्रांति की अलख जगाई।

इतिहास में इन भारतीय इतिहास की महान वीरांगनाएँ बहनों का साहस मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा और बलिदान का अनूठा प्रतीक माना जाता है।

 

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