जब मौत सामने खड़ी थी, तब भी गांधी अपने रास्ते से नहीं हटे
संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। महात्मा गांधी को समझने के लिए केवल उनके जीवन को देखना पर्याप्त नहीं है। उन्हें उनकी मृत्यु की ओर बढ़ते अंतिम वर्षों से भी समझना होगा। क्योंकि गांधी के जीवन का अंतिम अध्याय यह बताता है कि मृत्यु उनके लिए कोई अचानक आने वाली अनहोनी नहीं थी। वे अपने चारों ओर बढ़ते खतरे से परिचित थे, हिंसा के संकेतों को पहचानते थे और फिर भी सत्य, अहिंसा तथा निर्भयता के अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए। गांधीजी के जीवन पर कई बार जानलेवा हमले हुए। 25 जून 1934 को पुणे में उन पर हमला किया गया। इसके बाद भी उन्हें निशाना बनाने के प्रयास हुए। 1946 में उनकी रेलगाड़ी को दुर्घटनाग्रस्त करने का प्रयास किया गया। 20 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिरला हाउस में उनकी प्रार्थना सभा के दौरान बम विस्फोट हुआ। इसके बावजूद गांधी ने भय को अपने जीवन का केंद्र नहीं बनने दिया। दस दिन बाद, 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे की गोलियों ने उनके जीवन का अंत कर दिया। गांधी की विशेषता यह नहीं थी कि उन्हें खतरे का पता नहीं था। उनकी विशेषता यह थी कि खतरे का पता होने के बावजूद उन्होंने अपना रास्ता नहीं बदला।
मृत्यु से भय नहीं, जीवन से जिम्मेदारी :- गांधी के लिए मृत्यु जीवन की स्वाभाविक सच्चाई थी। 1937 में हनुमान प्रसाद पोद्दार ने उन्हें एक पत्र लिखकर अपने स्वप्न का उल्लेख किया था, जिसमें उन्होंने गांधीजी के अधिक दिनों तक जीवित न रहने का संकेत देखा था। पोद्दार ने यह भी इच्छा जताई कि उनका सपना गलत सिद्ध हो।
गांधी ने इस चिंता को प्रेम और आत्मीयता का संकेत माना। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था—मृत्यु कब आएगी, इसकी चिंता में जीवन को क्यों बदला जाए? मनुष्य को अपनी साधना और सेवा मृत्यु के भय से नहीं, जीवन के प्रत्येक क्षण में करनी चाहिए। गांधी के लिए मृत्यु कोई ऐसा कारण नहीं थी जिसके सामने जीवन के मूल्यों को छोड़ दिया जाए। वे मानते थे कि यदि सत्य सही है, तो मृत्यु के भय से भी उसे छोड़ा नहीं जा सकता।
20 जनवरी 1948 : बम के बाद भी प्रार्थना :- जनवरी 1948 में दिल्ली का वातावरण बेहद तनावपूर्ण था। विभाजन की हिंसा ने देश को भीतर तक घायल कर दिया था। गांधी हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक शांति के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। 20 जनवरी को बिरला हाउस की प्रार्थना सभा में बम विस्फोट हुआ। गांधी बच गए। उनके आसपास मौजूद लोगों में स्वाभाविक रूप से भय पैदा हुआ, लेकिन गांधी ने इस घटना को अपने जीवन पर हावी नहीं होने दिया।
गांधी के निकट रहने वालों के संस्मरण बताते हैं कि वे इस घटना को केवल किसी पागल व्यक्ति की हरकत मानकर टालने के पक्ष में नहीं थे। उन्हें समझ आ रहा था कि खतरा गंभीर है। फिर भी उनकी दिनचर्या नहीं बदली। प्रार्थना जारी रही। लोगों से मिलना जारी रहा। शांति के लिए प्रयास जारी रहे। यही गांधी की निर्भयता थी—खतरे को नकारना नहीं, बल्कि खतरे के बावजूद अपने कर्तव्य से पीछे न हटना।
मौत का आभास था :- अंतिम दिनों में गांधी से मिलने वाले कई लोगों ने उनके भीतर मृत्यु की निकटता का एक गहरा आभास महसूस किया। अमेरिकी पत्रकार विंसेंट शीन से हुई बातचीत के संस्मरणों में भी गांधी के जीवन के संभावित अंत की ओर संकेत मिलता है। लेकिन गांधी अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी नहीं कर रहे थे। वे परिस्थितियों को पढ़ रहे थे। उन्हें मालूम था कि वे ऐसे समय में खड़े हैं जब उनके विचारों से असहमत हिंसक शक्तियां उन्हें निशाना बना सकती हैं। फिर भी उनके व्यवहार में घबराहट नहीं आई। यहां गांधी की निर्भयता का असली अर्थ सामने आता है। निर्भयता का अर्थ खतरे से अनजान होना नहीं है। निर्भयता का अर्थ है-खतरे को पहचानते हुए भी सत्य से न हटना।
जीवन की रस्सी पर चलता एक आदमी :- गांधी की अंतिम यात्रा को एक ऐसे नट की तरह समझा जा सकता है, जो ऊंचाई पर बंधी रस्सी पर चलता है। उसे हर क्षण पता है कि नीचे गिरने पर मृत्यु हो सकती है, लेकिन उसका ध्यान नीचे की खाई पर नहीं, अपने संतुलन पर होता है।
गांधी भी जीवन की ऐसी ही रस्सी पर चलते रहे। एक ओर मृत्यु थी। दूसरी ओर सत्य। नीचे हिंसा की गहरी खाई थी। और सामने अहिंसा का संकीर्ण मार्ग। उन्होंने अपना संतुलन नहीं खोया। देश स्वतंत्र हो चुका था, लेकिन गांधी के लिए स्वतंत्रता केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं थी। विभाजन की हिंसा और सांप्रदायिक तनाव ने उन्हें भीतर तक व्यथित कर दिया था। जब देश राजनीतिक स्वतंत्रता का उत्सव मना रहा था, तब गांधी हिंसा से पीड़ित लोगों के बीच शांति की तलाश में थे। उनका जीवन का अंतिम संघर्ष सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं, मनुष्य के भीतर की हिंसा को समाप्त करने के लिए था।
अंतिम दिन और अंतिम यात्रा :- 30 जनवरी 1948 की शाम गांधी प्रार्थना सभा के लिए निकले। वे मनु और आभा के सहारे आगे बढ़ रहे थे। उनके पास हथियार नहीं था, कोई भारी सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी। वे उसी सहजता से प्रार्थना की ओर जा रहे थे, जैसे प्रतिदिन जाते थे। फिर नाथूराम गोडसे उनके सामने आया।गोलियां चलीं। गांधी गिर पड़े। एक युग का अंत हो गया। लेकिन उसी क्षण गांधी के जीवन का अंतिम संदेश और अधिक स्पष्ट हो गया। उन्होंने मृत्यु को आमंत्रित नहीं किया था। वे लंबा जीवन जीना चाहते थे। लेकिन वे मृत्यु के भय में जीना भी नहीं चाहते थे। उनका विश्वास था कि मनुष्य को अपने सत्य और कर्तव्य के साथ जीना चाहिए—चाहे परिस्थितियां कितनी ही कठिन क्यों न हों।
मृत्यु के सामने गांधी का अंतिम सत्याग्रह : – गांधी की हत्या केवल एक राजनीतिक हत्या नहीं थी। वह उस व्यक्ति पर हिंसा थी जिसने हिंसा के विरुद्ध अपना पूरा जीवन खड़ा किया था। इसलिए गांधी की मृत्यु को केवल उनकी जीवन-लीला का अंत मानना पर्याप्त नहीं है। उनकी मृत्यु उनके जीवन के दर्शन की अंतिम परीक्षा भी थी। उन्होंने जीवनभर कहा कि साध्य जितना महत्वपूर्ण है, साधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पवित्र लक्ष्य तक पहुंचने के लिए पवित्र साधनों का ही सहारा लिया जाना चाहिए। 30 जनवरी की शाम उन्होंने अपने जीवन से इस विचार की अंतिम गवाही दी। उनके सामने मृत्यु थी। फिर भी वे प्रार्थना के लिए जा रहे थे। उनके सामने खतरा था। फिर भी वे लोगों से मिलने से नहीं रुके। उनके सामने हिंसा थी। फिर भी उन्होंने अहिंसा नहीं छोड़ी।
यही गांधी की सबसे बड़ी शक्ति थी। गांधी ने मृत्यु को हराया नहीं; उन्होंने मृत्यु के भय को अपने सत्य पर हावी नहीं होने दिया। और शायद यही कारण है कि 30 जनवरी 1948 को उनका शरीर भले ही शांत हो गया, लेकिन उनका प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है-जब मृत्यु सामने खड़ी हो, तब क्या हम अपने सत्य के रास्ते पर टिके रह सकते हैं? गांधी का उत्तर उनके पूरे जीवन और उनकी अंतिम यात्रा में दिखाई देता है-सत्य का रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन भय के कारण उसे छोड़ा नहीं जा सकता। यही गांधी की मृत्यु के सामने खड़ी उनकी अंतिम निर्भयता थी। यही उनका सबसे अंतिम और सबसे कठिन सत्याग्रह था।
