मोहन थपलियाल की डायरी ‘संघर्ष और स्वप्न संसार’ का लोकार्पण
एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। कहानीकार एवं साहित्यकार मोहन थपलियाल की डायरी ‘संघर्ष और स्वप्न संसार’ का आज दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, देहरादून में लोकार्पण किया गया। इस अवसर उनको समर्पित फिल्म ‘पाताल ती’ का भी प्रदर्शन भी किया गया। सुपरिचित कहानीकार मोहन थपलियाल का लेखन पहाड़ के जनजीवन, सामाजिक विषमताओं, पलायन की पीड़ा और आम आदमी के संघर्षों से गहरे रूप में जुड़ा रहा। उनके साहित्य में पहाड़ की संवेदना के साथ सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्विरोधों पर भी मुखर अभिव्यक्ति दिखाई देती है। वे ऐसे लेखक थे, जिन्होंने अपने जीवनानुभवों और वैचारिक प्रतिबद्धता को लेखन का आधार बनाया। उनकी डायरी ‘संघर्ष और स्वप्न संसार’ उनके जीवन के संघर्षों, विचारों, अनुभवों और सामाजिक सरोकारों को समझने का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस डायरी का सम्पादन लखनऊ में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश पाण्डे ने किया है। यह पुस्तक काव्यांश प्रकाशन से छपकर आयी है।
सुपरिचित कवि एवं पद्मश्री सम्मान से अलंकृत श्री लीलाधर जगूड़ी ने अपने वक्तव्य में कहा कि जिसने पहाड़ नहीं देखा हो, वह मोहन थपलियाल का चेहरा देखे। उनके इस कथन ने मोहन थपलियाल के व्यक्तित्व और पहाड़ के साथ उनके गहरे जुड़ाव को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया।
मुख्य वक्ता के रूप में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मोहन थपलियाल के सहपाठी रहे प्रख्यात अनुवादक तथा स्पेनिश और पुर्तगाली भाषा एवं साहित्य के विशेषज्ञ प्रभाती नौटियाल ने कहा कि मोहन पहाड़ का अंश तो थे ही, लेकिन उन्होंने ब्रेख्त की कहानियों और कविताओं का अनुवाद करके समाज के विभिन्न पहलुओं से भी पाठकों को परिचित कराया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ‘लोकगंगा’ के संपादक आलोक प्रभाकर ने कहा कि मोहन थपलियाल पहाड़ के ऐसे लेखक रहे हैं, जिन्होंने पहाड़ के दर्द और पलायन की पीड़ा को गहरी संवेदनशीलता के साथ अपने लेखन में अभिव्यक्त किया। उनके वैचारिक सहयात्री बंधु कुशावर्ती ने कहा कि मोहन थपलियाल आम जनजीवन से जुड़े मुद्दों को अपने लेखन और चिंतन में प्रमुखता से उठाते रहे।
इस अवसर पर इब्बार रबी, गोविंद प्रसाद बहुगुणा, गीता गैरोला, राजेश सकलानी और अरुण कुकसाल इने डायरी के विभिन्न अंशों का पाठ किया। उन्होंने इन अंशों को वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़ते हुए मोहन थपलियाल के लेखन की प्रासंगिकता और उसकी वैचारिक गहराई को रेखांकित किया। मुम्बई में रह रहे मोहन थपलियाल के अभिन्न मित्र उ.प्र. के मुख्य नगर नियोजक श्री सुरेश घिल्डियाल ने भी अपने संदेश में उन्हें एक धीर गम्भीर और मानवीय संवेदनाओं का कथाकार बताया।
मोहन थपलियाल की बड़ी बेटी ने अपने भावुक वक्तव्य में कहा कि उनके पिता ने जीवन में कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वह उन्हें देखते और सुनते हुए बड़ी हुई हैं। उनकी मां, बहन और भाई ने भी विषम परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन परिवार ने कभी उनके विचारों का विरोध नहीं किया। उन्होंने कहा कि आज जब वह अपने पिता के लेखन की गहराई को समकालीन समाज से जोड़कर देखती हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि उनके पिता कितनी दूर तक सोच पाते थे। कार्यक्रम में चन्द्रकला भण्डारी ने मोहन थपलियाल के जीवन और साहित्यिक योगदान का परिचय दिया। उनके लेखन से प्रभावित संतोष ने कहा कि मोहन थपलियाल उनके आदर्श रहे हैं। उनकी स्मृति में आयोजित इस कार्यक्रम में फिल्म ‘पाताल ती’ का प्रदर्शन उनके लिए सौभाग्य और भावनात्मक जुड़ाव का अवसर रहा। कार्यक्रम के अंत में श्री शिवराज सिंह लोधियाल ने उपस्थित अतिथियों, साहित्यकारों, लेखकों, पाठकों, साहित्यप्रेमियों और मोहन थपलियाल के परिजनों के प्रति आभार व्यक्त किया। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य उत्तराखंड के साहित्यकारों, रचनाकारों और उनके साहित्यिक अवदान को व्यापक पाठक समाज के सामने लाना तथा साहित्य, संस्कृति और समाज से जुड़े विषयों पर सार्थक संवाद के लिए एक साझा मंच उपलब्ध कराना रहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार, लेखक, कवि, पाठक, साहित्यप्रेमी, बुद्धिजीवी और मोहन थपलियाल के परिजन उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने उस उपस्थित वक्ताओं और अतिथियों व आम लोगों का स्वागत, अभिनंदन किया।
कार्यक्रम का संचालन एडवोकेट चन्द्रकला ने किया। कुल मिलाकर इस आयोजन ने यह रेखांकित किया कि साहित्यकार का जीवन और उसका लेखन अपने समय, समाज और परिवेश की स्मृतियों को सहेजने का महत्वपूर्ण माध्यम होता है। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ऐसे आयोजनों के माध्यम से उत्तराखंड की साहित्यिक विरासत के संरक्षण, रचनाकारों के मूल्यांकन और नई पीढ़ी को अपने साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परिवेश से जोड़ने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है।
कार्यक्रम में डॉ. योगेश धस्माना, डॉ. सुभाष थलेड़ी, शांति प्रकाश जिज्ञासु, डॉ. मुनिराम सकलानी, नवीन नैथानी, अरुण असफल, द्विजेंद्र बहुगुणा, डॉ. अतुल शर्मा, मोहन सिंह चौहान, कमलेश भट्ट, विशाल सिंह,सुंदर सिंह बिष्ट, सुरेन्द्र सजवाण, रंजना शर्मा, गीता गैरोला, निरंजन सुयाल, शशि भूषण, शूरवीर सिंह रावत, कमलेश खन्तवाल, अपर्णा वर्धन आलोक सरीन, सहित कई लेखक,साहित्यकार, पाठक व शहर के प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे।
