जब लालसेना ने तानाशाह हिटलर को आत्महत्या के लिए विवश किया : अनन्त आकाश
अनन्त आकाश /एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून, 30 अप्रैल। विश्व विजेता का स्वप्न देख रहे जर्मन के तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उसे आत्महत्या के लिए विवश होना पडे़गा। उसकी सनक ने जर्मन सहित कई देशों के हाल इतने बदतर कर दिये थे कि आखिर दिन उसकी मौत पर रोने वाला कोई नहीं था,इससे ज्यादा उसके लिए क्या बुरा होगा । अन्त समय में उसकी लाखों की फौज भी उसे बचा नहीं पायी। सोचो ! आत्महत्या करने से पहले वह कितने दशहत में था ? वह खा पी नहीं रहा था ,उसकी मनोस्थिति इतनी खराब हो चुकी थी कि उसकी रूह सम्भावित हार से कांप रही थी ।उसका करीबी दुनिया का सबसे बड़ा झूठा इन्सान गोविल्स सहित दूसरे दिन 1 मई 1945 को आत्महत्या की। इस प्रकार हिटलर के लगभग 3 हजार से भी ज्यादा करीबियों ने एक के बाद एक आत्महत्याएऐं की। वे मानवता के साथ इतना बड़ा अपराध कर चुके थे कि अब सच का सामना नहीं कर सकते थे । हिटलर ने आज ही के दिन 30 अप्रैल 1945 को आत्महत्या कर ली थी. एक स्कूल का प्रिंसिपल पोल स्मिथ फल्ड जो जर्मनी में हिटलर के नाज़ी कैम्प से किसी तरह बच निकला था उसने लिखा है कि: “मैं हिटलर के मृत्यु दण्ड वाले कैम्प से बच निकला था, मेरी आँखों ने वहाँ जो देखा था, मैं चाहता हूँ कि उसे दुनिया में और कोई कभी न देखे,उन कैम्प में मौत वाले गैस चैम्बरों को क़ाबिल इंजीनियरों द्वारा बनाया तथा क़ाबिल और कुशल डॉक्टर बच्चों को ज़हर देते थे, प्रशिक्षित नर्सें नवजात बच्चों को जान से मारती थीं,औरतें और बच्चों को कॉलेज से पढ़े लिखे गोली से मारते थे, वही यहूदी जो हिटलर के शिकार थे आज वही ईरान,फिलिस्तीनियों और लेबनान के साथ वही कर रहे हैं और वे बहुत सारे नरसंहारों के लिये सीधेतौर पर जिम्मेदार हैं! इसलिए शिक्षित होना ही प्रर्याप्त नहीं बल्कि इससे पहले इंसानियत व चेतनशील होना बहुत जरूरी है, आज दुविधा यह हझ कि हमारे देश का पढा लिखा बुध्दीजीव भी ऐसे लोगों का बढावा दे रहा है जो अन्तत: उसी विचार के हिस्से जिस पर हिटलर चला करता था, हमारे देश के शासकों को भी निश्चित तौर पर न्यूरेनवर्ग के दस्तावेजों का अध्ययन करना चाहिए। क्योंकि वे भी कहीं न कहीं हिटलरी तथ्य गोविल्स विचार के उपासक हैं , हिटलरशाही के नक्शे कदम पर हैं। इतिहास गवाह है कि हिटलरशाही का कितना बुरा हश्र हुआ ! हिटलर एवं उसके साथियों ने अपने देश में जनता में लोकप्रियता हासिल करने के बाद उनके साथ बड़ा धोखा किया। हिटलर की फार्टी ने जर्मन कौम के श्रेष्ठता के नारे को आगे बढ़ाते हुऐ है कहा कि उन्हें ही जीने का अधिकार है तथा अन्य कौमों को उनकी दया एवं रहमोकरम पर
जीना होगा। ठीक वैसा ही हमारे देश में कठ्ठर हिन्दुत्वादी संगठन कर रहे हैं। जिन्हें सरकारी संरक्षण प्राप्त है। आज हमारे देश में दूसरे मजहबों को नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के षढयन्त्र चल रहे हैं। परिणामस्वरूप साम्प्रदायिक तनाव अपने चरम पर है। हिटलर ने जर्मनी में.विरोधियों ,कम्युनिस्टों , यहुदियों का तरह-तरह से नरसंहार किया था, जिसमें लाखों -लाख लोग मारे गये। इन्हें मारने के लिए गैस चैम्बरों तथा जहरीली दवाईयों का इस्तेमाल किया गया जिनमें बच्चे ,बुढ्ढे भी शामिल थे। हिटलर ने जर्मनी की तमाम प्रगतिशील शिक्षण संस्थानों को तहस नहस किया । हिटलर का मन्त्री गोविल्स तो कहता था कि झूठ को बार बार इस तरह फैलाओ कि वह जनता को सच्च लगने लगे ,हमारे देश में कुछ इसी प्रकार की मुहिम जोरों से चलाई जा रही है ,धर्मान्तता एवं अन्धराष्ट्रवाद जिसके केन्द्र में हैं। जनता मंहगाई , बेरोजगारी, भ्रष्टाचार तथा देश की बर्बादी पर चुप रहे ,यदि कोई बोलेगा तो झूठे केसों में फंसाकर जेल की यातनाएं दी जाऐगी या फिर राष्ट्रविरोधियों की श्रेणी में रखा जाऐगा। हिटलर के सनकी मिजाज के कारण द्वितीय विश्व युद्ध में 7करोड़ से भी ज्यादा नागरिकों की जाने गयी । जिसमें अकेले सोवियत संघ के 5 करोड़ नागरिक शामिल थे ।इस युद्ध ने सोवियत संघ सहित कई देशों में भारी तबाही मचाई ।उस समय सोवियत संघ के पीएम एव कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव कामरेड स्टालिन थे जिनके कुशल नेतृत्व ने इस भयावह स्थिति को पलट के रख दिया । जिसका अन्त विश्व के फासीवादी तानाशाह हिटलर की आत्महत्या से हुआ । हालांकि जर्मन तानाशाह तक पहुंचने के लिए 3 लाख सोवियत सैनिकों को शहीद होना पड़ा तथा हिटलर के जर्मन बचाने के लिए 40लाख जर्मन सैनिकों ने अपनी जानें दी। फिर भी हिटलर नहीं बच पाया ।30 अप्रैल 1945 को सोवियत लाल सेना अन्ततः जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुंचकर लालझण्डे फहराने में सफल रही। यहाँ से हिटलर तथा फासीवादियों का ऐसे अन्त की शुरुआत हुई जो उन्होंने सपने में सोचा नहीं होगा। अन्त में तानाशाह मनोवृत्ति के चाहे हमारे देश के हों या विश्व के किसी अन्य देश के या फिर कितने ही गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले नेता हों ! देश की जनता कभी – कभी न कभी अन्तिम हिसाब करती है। हिटलर न रहा , तो उसके चेलों की क्या औकात !
लेखक अनन्त आकाश सीपीआई (एम) देहरादून के सचिव हैं.
