पं. श्रीराम शर्मा ने किया था वायसराय लॉर्ड वेवेल के राजमहल के सामने विजय चौक नई दिल्ली में झण्डा फहराने का चमत्कार

संदीप गोयल\एस.के.एम. न्यूज सर्विस

देहरादून। 26 जनवरी 1943 को वायसराय लॉर्ड वेवेल के राजमहल के सामने विजय चौक, नई दिल्ली में झण्डा फहराने का जो चमत्कारी और शत्रु-रूमानहारी महोत्सव हुआ, वह पं. श्रीराम शर्मा ‘प्रेम’ ने किया था।

पं. श्रीराम शर्मा ‘प्रेम’

पिता : श्री रविदत्त

पत्नी : श्रीमती रमा शर्मा

निवासी : 36, सुभाष मार्ग, देहरादून

जन्म : 10 फरवरी 1913

निधन : 18 जुलाई 1978

पं. श्रीराम शर्मा का जन्म सुलतानपुर जनपद में हुआ था। वह राष्ट्रीय स्तर के कवि थे और इनके अनेक काव्य संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें अधिकांश राष्ट्रीय रचनाओं से युक्त थे। 26 जनवरी 1943 को वायसराय लॉर्ड वेवेल के राजमहल के सामने विजय चौक, नई दिल्ली में झण्डा फहराने का जो चमत्कारी और शत्रु-रूमानहारी महोत्सव हुआ, वह भी उत्तर प्रदेश की ही विभूति का कारनामा था। दिल्ली में जिस पर कहीं दूर का भी संदेह था, वह भी पकड़ लिया गया था और सरकार को रिपोर्ट दे दी गयी थी कि अब कहीं पत्ता भी नहीं खड़क सकता। पर सत्याग्रह कौंसिल तो नई दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस मनाने का निश्चय कर चुकी थी। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बंगाल के स्वयं सेवकों ने इसमें भाग लिया। इसका नेतृत्व किया उ.प्र. के सशक्त कवि और उस समय फरार श्री श्रीराम शर्मा ‘प्रेम’ ने। सेक्रेट्रियट में ज्यों ही भोजन का अवकाश हुआ, त्यों ही 18 वेशधारी, डण्डों पर तिरंगे झण्डे लगाए सेवक विजय चौक पहुँच गये। उनके नारों से विजय चौक खूब गूँजा। खबर पाकर पुलिस आई तो अफसर सकपकाये हुए थे। उनका प्रश्न था- “तुम कहाँ से आ मरे यहाँ?” सत्याग्रह कौंसिल, जिसने अनन्त तक सत्याग्रह का संचालन किया, उसमें उ.प्र. के बाबा राघव दास और श्रीमती सुचेता कृपलानी भी थीं। छह आदमी तो सरकार के द्वारा इनामों की घोषणा करने पर भी न पकड़े जा सके, उनमें श्री हीरावल्लभ त्रिपाठी और श्री अच्युत पटवर्धन, ये ही उत्तर प्रदेश के दो वीर थे। ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान 1944 में भी इनको दिल्ली में 1 वर्ष कारावास की सजा हुई।

नगर निगम देहरादून द्वारा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री राम शर्मा ‘प्रेम’ के सम्मान में उनके नाम पर मार्ग का नामकरण किया गया है। यह मार्ग आज भी शहर के नागरिकों को देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले वीर सेनानियों की याद दिलाता है। स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक स्थानीय सेनानियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। श्री राम शर्मा ‘प्रेम’ उन देशभक्तों में शामिल थे जिन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान दिया। उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से नगर निगम ने इस मार्ग का नाम उनके नाम पर रखा।

ऐसे ऐतिहासिक मार्ग केवल पहचान का माध्यम नहीं हैं, बल्कि नई पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जोड़ने का भी कार्य करते हैं। इतिहासकारों का मानना है कि शहर की सड़कों, भवनों और सार्वजनिक स्थलों के नाम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर होना उनके योगदान के प्रति समाज की कृतज्ञता का प्रतीक है। आज आवश्यकता है कि ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन और योगदान को विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं तथा जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपने इतिहास और विरासत से परिचित हो सकें।

 

 

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