एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस

देहरादून।  अंग्रेजों के सत्तासीन होने के उपरांत मेरठ एक बड़ा सेना का केन्द्र रहा है। 10 मई, 1857 को अंग्रेजी शासन के खिलाफ ब्रिटिश सेना के भारतीय जवानों द्वारा विद्रोह यहीं से आरंभ हुआ। उन्होंने मेरठ शहर पर एक दिन में ही नियंत्रण कर लिया तथा दिल्ली के लाल किंले की ओर कूच कर दिया जो किं संपूर्ण भारत पर नियंत्रण का द्योतक था। उनके इस आभयान में साधारण लोग भी शामिल होते चले गए तथा देशभक्ति के नारे लगाते गए। अगली सुबह लाल किंला स्वाधीनता सेनानियों के कब्जे में था। मेरठ से आरंभ हुई यह चिंगारी शीघ्र ही संपूर्ण देश में ज्वाला के रुप में फैल गई तथा स्वाधीनता के राष्ट्रीय संघर्ष का रुप ले लिया। अंग्रेजों को इस स्वतंत्रता संग्राम को दबाने में एक वर्ष का समय लगा। तथापि मेरठ से आरंभ हुए इस स्वतंत्रता के आंदोलन ने संपूर्ण देश के राष्ट्र प्रेमियों को सदैव प्रेरित किंया। कालांतर में उन्नीसवीं शताब्दी में यही आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन का पथ प्रदर्शक बना।

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत 10 मई 1857 को मेरठ से हुई थी। इस महान ऐतिहासिक विद्रोह की चिंगारी सबसे पहले 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे द्वारा जलाई गई थी, लेकिन इसका व्यापक और आधिकारिक विस्फोट 10 मई 1857 को मेरठ में हुआ। 1857 का भारतीय विद्रोह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ 1857-58 में भारत में एक बड़ा विद्रोह था, जो ब्रिटिश ताज की ओर से एक संप्रभु शक्ति के रूप में कार्य करता था। विद्रोह 10 मई 1857 को दिल्ली से 40 मील (64 किमी) उत्तर-पूर्व में मेरठ के गैरीसन शहर में कंपनी की सेना के सिपाहियों के विद्रोह के रूप में शुरू हुआ। इसके बाद यह मुख्य रूप से ऊपरी गंगा के मैदान और मध्य भारत में अन्य विद्रोहों और नागरिक विद्रोहों में बदल गया, हालांकि विद्रोह की घटनाएं उत्तर और पूर्व में भी हुईं। विद्रोह ने उस क्षेत्र में ब्रिटिश सत्ता के लिए एक सैन्य खतरा पैदा कर दिया, और 20 जून 1858 को ग्वालियर में विद्रोहियों की हार के साथ ही इस पर काबू पाया जा सका। 1 नवंबर 1858 को, ब्रिटिशों ने हत्या में शामिल नहीं होने वाले सभी विद्रोहियों को माफी दे दी, हालांकि उन्होंने 8 जुलाई 1859 तक औपचारिक रूप से शत्रुता समाप्त होने की घोषणा नहीं की। विद्रोह के नाम पर विवाद है और इसे सिपाही विद्रोह, भारतीय विद्रोह, महान विद्रोह, 1857 का विद्रोह और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में वर्णित किया गया है।

ईस्ट इंडिया कम्पनी ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में सन 1757 में प्लासी का युद्ध जीता। युद्ध के बाद हुई संधि में अंग्रेजों को बंगाल में कर मुक्त व्यापार का अधिकार मिल गया। सन 1764 में बक्सर का युद्ध जीतने के बाद अंग्रेजों का बंगाल पर पूरी तरह से अधिकार हो गया। इन दो युद्धों में हुई जीत ने अंग्रेजों की ताकत को बहुत बढ़ा दिया और उनकी सैन्य क्षमता को परम्परागत भारतीय सैन्य क्षमता से श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया। कंपनी ने जल्द ही बॉम्बे और मद्रास में अपने ठिकानों के आसपास अपने क्षेत्रों का विस्तार किया; बाद में, आंग्ल-मैसूर युद्ध (1766-1799) और आंग्ल-मराठा युद्ध (1772-1818) के कारण भारत के और भी अधिक हिस्से पर कंपनी का नियंत्रण हो गया।

19वीं शताब्दी के अंत के बाद, गवर्नर-जनरल वेलेस्ली ने कंपनी क्षेत्रों के दो दशकों के त्वरित विस्तार की शुरुआत की। यह या तो कंपनी और स्थानीय शासकों के बीच सहायक गठबंधनों द्वारा या सीधे सैन्य विलय द्वारा हासिल किया गया था। सहायक गठबंधनों ने हिन्दू महाराजाओं और मुस्लिम नवाबों की रियासतों का निर्माण किया। सन 1843 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने सिन्ध क्षेत्र पर रक्तरंजित लडाई के बाद अधिकार कर लिया। सन 1839 में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद कमजोर हुए पंजाब पर अंग्रेजों ने अपना हाथ बढा़या और सन 1849 में द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के बाद पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत और कश्मीर पर कब्ज़ा कर लिया गया; हालाँकि, 1846 की अमृतसर संधि के तहत कश्मीर को तुरंत जम्मू के डोगरा राजवंश को बेच दिया गया और इस तरह यह एक रियासत बन गया।। सन 1853 में आखरी मराठा पेशवा बाजी राव के दत्तक पुत्र नाना साहेब की पदवी छीन ली गयी और उनका वार्षिक खर्चा बंद कर दिया गया। सन 1854 में बरार और सन 1856 में अवध को कंपनी के राज्य में मिला लिया गया।

१८५७ के विद्रोह का एक प्रमुख कारण कंपनी द्वारा भारतीयों का आर्थिक शोषण भी था। कंपनी की नीतियों ने भारत की पारम्परिक अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त कर दिया था। इन नीतियों के कारण बहुत से किसान, कारीगर, श्रमिक और कलाकार कंगाल हो गये। इनके साथ साथ जमींदारों और बड़े किसानों की स्थिति भी बदतर हो गयी। सन १८१३ में कंपनी ने एक तरफा मुक्त व्यापार की नीति अपना ली इसके अन्तर्गत ब्रितानी व्यापारियों को आयात करने की पूरी छूट मिल गयी, परम्परागत तकनीक से बनी हुई भारतीय वस्तुएं इसके सामने टिक नहीं सकी और भारतीय शहरी हस्तशिल्प व्यापार को अकल्पनीय क्षति हुई।

सन 1848 और 1858 के बीच लार्ड डलहोजी ने डाक्ट्रिन औफ़ लैप्स के कानून के अन्तर्गत अनेक राज्यों पर अधिकार कर लिया। इस सिद्धांत अनुसार कोई राज्य, क्षेत्र या ब्रितानी प्रभाव का क्षेत्र कंपनी के अधीन हो जायेगा, यदि क्षेत्र का राजा निसन्तान मर जाता है या शासक कंपनी की दृष्टि में अयोग्य साबित होता है। इस सिद्धांत पर कार्य करते हुए लार्ड डलहोजी और उसके उत्तराधिकारी लार्ड कैन्निग ने सतारा,नागपुर,झाँसी,अवध को कंपनी के शासन में मिला लिया। कंपनी द्वारा तोडी गय़ी सन्धियों और वादों के कारण कंपनी की राजनैतिक विश्वसनियता पर भी प्रश्नचिन्ह लग चुका था। सन १८४९ में लार्ड डलहोजी की घोषणा के अनुसार बहादुर शाह के उत्तराधिकारी को ऐतिहासिक लाल किला छोड़ना पडेगा और शहर के बाहर जाना होगा और सन १८५६ में लार्ड कैन्निग की घोषणा कि बहादुर शाह के उत्तराधिकारी राजा नहीं कहलायेंगे ने मुगलों को कंपनी के विद्रोह में खडा कर दिया।

विद्रोह का प्रारम्भ एक बंदूक की वजह से हुआ। सिपाहियों को पैटऱ्न १८५३ एनफ़ील्ड बंदूक दी गयीं जो कि ०.५७७ कैलीबर की बंदूक थी तथा पुरानी और कई दशकों से उपयोग में लायी जा रही ब्राउन बैस के मुकाबले में शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक में गोली दागने की आधुनिक प्रणाली (प्रिकशन कैप) का प्रयोग किया गया था परन्तु बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया पुरानी थी। नयी एनफ़ील्ड बंदूक भरने के लिये कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था और उसमे भरे हुए बारुद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस को डालना पड़ता था। कारतूस का बाहरी आवरण में चर्बी होती थी जो कि उसे पानी की सीलन से बचाती थी।

वास्तविक विद्रोह से पहले कई महीनों तक विभिन्न घटनाओं के साथ तनाव बढ़ता रहा। 26 फरवरी 1857 को 19वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री (बीएनआई) रेजिमेंट चिंतित हो गई कि उन्हें जो नए कारतूस जारी किए गए थे, वे गाय और सुअर की चर्बी लगे कागज में लपेटे गए थे, जिन्हें मुंह से खोलना पड़ता था, जिससे उनकी धार्मिक संवेदनाएं प्रभावित हो रही थीं। उनके कर्नल ने परेड मैदान पर तोपखाने और घुड़सवार सेना के समर्थन से उनका सामना किया, लेकिन कुछ बातचीत के बाद तोपखाना वापस ले लिया और अगली सुबह की परेड रद्द कर दी।

मुख्य घटनाक्रम

29 मार्च 1857: बैरकपुर में मंगल पांडे ने चर्बी वाले कारतूसों के विरोध में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कदम उठाया।

08 अप्रैल 1857: मंगल पांडे को अंग्रेजों द्वारा फांसी दी गई।

10 मई 1857: मेरठ के भारतीय सैनिकों ने बगावत कर दी, जेल तोड़ी और दिल्ली की ओर कूच किया।

11 मई 1857: विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली पहुंचकर मुगल बादशाह बहादुर शाह द्वितीय को अपना नेता घोषित किया।

क्रांति का विस्तार

कानपुर: नाना साहेब ने कमान संभाली।

झांसी: रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया।

लखनऊ: बेगम हजरत महल ने नेतृत्व किया।

Don't Miss

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *