झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का लगभग 175 साल पुराना दुर्लभ चित्र
संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। मध्य प्रदेश के दतिया संग्रहालय के अभिलेखागार में सुरक्षित लगभग 175 वर्ष पुराने एक दुर्लभ चित्र ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से जुड़े इतिहास को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह चित्र रानी की जीवित अवस्था और उनके समकालीन काल का हो सकता है। यदि इसकी पुष्टि होती है, तो यह रानी लक्ष्मीबाई के जीवन और व्यक्तित्व को समझने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत साबित होगा।
करीब दो फीट लंबे और पौने दो फीट चौड़े इस चित्र में रानी लक्ष्मीबाई को घोड़े पर सवार दिखाया गया है। प्राचीन कागज पर बने इस रंगीन चित्र में सोने के कणों का भी इस्तेमाल किया गया है, जो आज भी प्रकाश में चमकते दिखाई देते हैं। यह दुर्लभ कलाकृति दतिया संग्रहालय में लंबे समय से गुमनाम पड़ी थी।
ज्ञान भारतम अभियान के दौरान सामने आया चित्र
बताया गया है कि ‘ज्ञान भारतम’ अभियान के अंतर्गत पांडुलिपियों और ऐतिहासिक सामग्री के संग्रहण एवं संरक्षण के दौरान दतिया संग्रहालय की इस पेंटिंग पर विशेषज्ञों का ध्यान गया। मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग के आयुक्त मदन कुमार नागरगोजे तथा दतिया के वर्तमान कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े के बीच संग्रहालय की अल्पज्ञात मराठा पेंटिंग्स को लेकर हुई चर्चा के बाद इनके संरक्षण का प्रस्ताव सामने आया।
विशेषज्ञों के अनुसार पेंटिंग को लगभग 1849-50 के आसपास का माना जा रहा है। यह काल रानी लक्ष्मीबाई के पति महाराजा गंगाधर राव के निधन, वर्ष 1853, से पहले का था।
कुलदेवी की पूजा का दृश्य होने की संभावना
इतिहासकारों के अनुसार रानी लक्ष्मीबाई विशेष परिस्थितियों में कड़ी सुरक्षा के बीच कुलदेवी की पूजा के लिए जाती थीं। पेंटिंग में दिखाई देने वाला दृश्य इसी प्रकार की किसी धार्मिक यात्रा से जुड़ा होने की संभावना व्यक्त की गई है।
डॉ. वसीम के अनुसार रानी लक्ष्मीबाई बहुत सीमित और विशेष लोगों से ही मिलती थीं। यही कारण माना जाता है कि उनके जीवनकाल के चित्र अत्यंत दुर्लभ हैं। उस समय झांसी दरबार में चित्रकारों को संरक्षण प्राप्त था और मुख्य चित्रकारों में सुखलाल का नाम मिलता है। विशेषज्ञ इस संभावना से भी इनकार नहीं करते कि यह चित्र सुखलाल द्वारा बनाया गया हो।
1858 के बाद दतिया पहुंचा था चित्र?
उपलब्ध विवरण के अनुसार 18 जून 1858 को अंग्रेजों से युद्ध करते हुए रानी लक्ष्मीबाई के वीरगति प्राप्त करने के बाद दतिया रियासत की ओर से भेजे गए कर्मचारियों ने उनके महल से कुछ सामग्री सुरक्षित कर दतिया पहुंचाई थी। बाद में रियासतों के विलय के पश्चात यह चित्र पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में सुरक्षित हो गया।
अब तक रानी लक्ष्मीबाई का जो चित्र पुस्तकों और इंटरनेट पर सबसे अधिक दिखाई देता है, वह मुख्यतः श्वेत-श्याम स्वरूप में है। बताया जाता है कि यह चित्र उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव के माध्यम से बाद में तैयार कराया गया था।
इतिहास के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की समकालीन पेंटिंग का मिलना उस दौर को समझने के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि होती है। रानी लक्ष्मीबाई से संबंधित इस चित्र की वैज्ञानिक एवं ऐतिहासिक जांच तथा संरक्षण के बाद इसकी प्रामाणिकता को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
पुरातत्व विभाग की योजना इस दुर्लभ धरोहर को संरक्षित कर भविष्य में आम जनता और शोधकर्ताओं के लिए प्रदर्शित करने की है।
रानी लक्ष्मीबाई : साहस और संघर्ष की प्रतीक
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में मणिकर्णिका तांबे के रूप में हुआ था। बचपन में उन्हें प्यार से ‘मनु’ कहा जाता था। साहस, घुड़सवारी और शस्त्र संचालन में दक्ष मनु का विवाह वर्ष 1842 में झांसी के महाराजा गंगाधर राव से हुआ और वे लक्ष्मीबाई कहलायीं।
अपने पुत्र की असामयिक मृत्यु और वर्ष 1853 में महाराजा गंगाधर राव के निधन के बाद झांसी के सामने उत्तराधिकार का संकट खड़ा हुआ। ब्रिटिश शासन की ‘हड़प नीति’ के तहत दत्तक पुत्र दामोदर राव को उत्तराधिकारी स्वीकार नहीं किया गया और झांसी को ब्रिटिश शासन में मिलाने का प्रयास किया गया।
इसका रानी लक्ष्मीबाई ने प्रखर विरोध किया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अद्भुत साहस और सैन्य नेतृत्व का परिचय दिया। 18 जून 1858 को ग्वालियर के निकट युद्ध करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुईं।
रानी लक्ष्मीबाई आज भी भारतीय इतिहास में वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के संघर्ष की अमर प्रतीक के रूप में स्मरण की जाती हैं।
