August 19, 2026

संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। अप्रैल 1919 में जलियांवाला बाग में हुआ नरसंहार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का ऐसा मोड़ था, जिसने देश की राजनीतिक चेतना को गहराई से झकझोर दिया। 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलवाई गईं। इसके बाद पंजाब के अनेक हिस्सों में मार्शल लॉ और दमनात्मक कार्रवाइयों ने ब्रिटिश शासन की क्रूरता को उजागर कर दिया।
इसी भयावह पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 34वां अधिवेशन 27 दिसंबर 1919 से 1 जनवरी 1920 तक अमृतसर में हुआ। अधिवेशन की अध्यक्षता पंडित मोतीलाल नेहरू ने की और स्वागत समिति के अध्यक्ष स्वामी श्रद्धानंद थे। कांग्रेस के आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार अधिवेशन में 7,031 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
यह महज कांग्रेस का एक वार्षिक अधिवेशन नहीं था। जिस शहर में कुछ महीने पहले सैकड़ों भारतीयों पर गोलियां चली थीं, उसी शहर में देशभर के प्रतिनिधियों का जुटना अपने आप में राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक था। जलियांवाला बाग की त्रासदी अधिवेशन के केंद्र में थी और कांग्रेस ने ब्रिटिश प्रशासन की भूमिका की कड़ी निंदा की।
ब्रिटिश दमन की स्वतंत्र जाँच
जलियांवाला बाग और पंजाब में मार्शल लॉ के दौरान हुए अत्याचारों की जाँच के लिए ब्रिटिश सरकार ने हंटर समिति गठित की थी। कांग्रेस ने इस सरकारी जाँच से अलग अपना गैर-सरकारी जाँच दल गठित किया। इसमें मोतीलाल नेहरू, चित्तरंजन दास, अब्बास तैयबजी, एम. आर. जयकर और महात्मा गांधी शामिल थे। गांधी ने बाद में अपने आत्मकथात्मक विवरण में इस समिति और पंजाब में किए गए अपने जाँच-कार्य का उल्लेख किया है।
कांग्रेस के इस प्रयास का उद्देश्य पंजाब में मार्शल लॉ के दौरान हुए दमन, गिरफ्तारियों, अपमानजनक कार्रवाइयों और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन को सामने लाना था। गांधी ने स्वयं पंजाब के अनेक प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और पीड़ितों के बयान दर्ज करने के काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अमृतसर अधिवेशन में जनरल डायर और पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर की भूमिका की निंदा की गई। कांग्रेस ने हंटर समिति के बहिष्कार का समर्थन किया तथा रॉलेट एक्ट और प्रेस एक्ट को समाप्त करने की मांग भी उठाई।
गांधी का असहज करने वाला सवाल
लेकिन इस अधिवेशन की एक विशेषता ऐसी भी थी, जो गांधी की राजनीति को तत्कालीन राष्ट्रवादी राजनीति से अलग पहचान देती है। गांधी ने केवल ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों की निंदा नहीं की, बल्कि भारतीयों द्वारा की गई हिंसा की भी आलोचना की।
अमृतसर अधिवेशन में गांधी ने पंजाब और गुजरात में भीड़ द्वारा किए गए हिंसक कृत्यों पर खेद व्यक्त करने वाला प्रस्ताव रखा। कांग्रेस के आधिकारिक विवरण में इसे अधिवेशन के महत्वपूर्ण प्रस्तावों में गिना गया है।
गांधी के लिए अहिंसा केवल विदेशी शासन के विरुद्ध राजनीतिक रणनीति नहीं थी। वह भारतीयों के आचरण की भी कसौटी थी। उनका आग्रह था कि यदि भारतीय ब्रिटिश शासन की हिंसा और अन्याय का विरोध करते हैं, तो उन्हें अपने आचरण में भी हिंसा, प्रतिशोध और घृणा से बचना होगा।
यही विचार आगे चलकर गांधी की राजनीति में ‘आत्मशुद्धि’ की धारणा का महत्वपूर्ण आधार बना। उनके लिए स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं थी; वह व्यक्ति और समाज के नैतिक रूपांतरण से भी जुड़ी थी।
अस्पृश्यता के प्रश्न ने भी दी दस्तक
अमृतसर अधिवेशन का एक और महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक सुधार से जुड़ा था। स्वामी श्रद्धानंद, जो अधिवेशन की स्वागत समिति के अध्यक्ष थे, सामाजिक विषमता और अस्पृश्यता के प्रश्न को गंभीरता से उठाने वाले प्रमुख नेताओं में थे। उनके लिए राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता था।
गांधी की आगे की राजनीति में यह विचार और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आया। वे बार-बार कहते रहे कि जिस समाज में अपने ही लोगों को कुओं, मंदिरों और सार्वजनिक जीवन से दूर रखा जाता है, वह विदेशी शासन के अन्याय के विरुद्ध नैतिक रूप से पूरी शक्ति के साथ कैसे खड़ा हो सकता है?
यहाँ गांधी की आत्मालोचना का अर्थ ब्रिटिश शासन के अपराधों को कमतर आंकना नहीं था। जलियांवाला बाग और पंजाब के दमन की उनकी निंदा स्पष्ट और कठोर थी। उनका तर्क यह था कि एक अन्याय का विरोध करते हुए दूसरे अन्याय को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
1921 में गांधी ने इसे और तीखा किया
यह विचार 1919 के बाद गांधी के लेखन में और स्पष्ट हुआ। 1921 में अस्पृश्यता के प्रश्न पर लिखते हुए उन्होंने भारतीय समाज की सामाजिक बहिष्कार की व्यवस्था की तुलना रूपकात्मक रूप से ‘Dyerism’ और ‘O’Dwyerism’ से की। उनका आशय यह था कि जिस प्रकार औपनिवेशिक सत्ता ने भारतीयों पर दमन किया, उसी प्रकार भारतीय समाज ने अपने ही वंचित वर्गों के साथ अमानवीय व्यवहार किया है।
यह गांधी की राजनीति का अत्यंत असुविधाजनक, लेकिन महत्वपूर्ण पक्ष था। वे राष्ट्रवाद को केवल ‘अंग्रेजों के विरुद्ध’ आंदोलन बनाकर नहीं देखना चाहते थे। उनके लिए राष्ट्रनिर्माण का अर्थ समाज के भीतर मौजूद भेदभाव, भय, हिंसा और सामाजिक अपमान को चुनौती देना भी था।
स्वराज का व्यापक अर्थ
यही कारण है कि गांधी के लिए स्वराज का अर्थ केवल विदेशी शासन की समाप्ति नहीं था। स्वराज में राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आत्मसंयम, सामाजिक समानता, निर्भयता और नैतिक जिम्मेदारी भी शामिल थी।
अमृतसर अधिवेशन के समय गांधी अभी उस व्यापक जनांदोलन के नेता नहीं बने थे, जिसके रूप में वे अगले कुछ वर्षों में उभरे। लेकिन 1919 का दौर उनके राजनीतिक चिंतन में निर्णायक परिवर्तन का समय था। जलियांवाला बाग और पंजाब के दमन ने ब्रिटिश शासन के प्रति उनके विश्वास को गहरा आघात पहुँचाया। इसके साथ ही उन्होंने यह भी महसूस किया कि स्वतंत्रता का संघर्ष भारतीय समाज के आत्मसुधार से अलग नहीं हो सकता। बाद में यही सोच असहयोग आंदोलन और उसके साथ जुड़े रचनात्मक कार्यक्रमों में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
इतिहास से आज का सवाल
1919 का अमृतसर अधिवेशन इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के दो पक्षों को एक साथ सामने रखा—औपनिवेशिक सत्ता के अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और अपने समाज के भीतर मौजूद अन्याय के विरुद्ध आत्ममंथन।
जलियांवाला बाग में ब्रिटिश शासन की क्रूरता ने भारतीयों को स्वतंत्रता की कीमत का अहसास कराया। लेकिन गांधी का आग्रह इससे आगे था। वे पूछ रहे थे कि यदि हम न्याय, सम्मान और स्वतंत्रता की मांग करते हैं, तो क्या वही न्याय, सम्मान और समानता हम अपने समाज के प्रत्येक व्यक्ति को देने के लिए तैयार हैं?
यह सवाल आज भी इतिहास के पन्नों में जीवित है।
अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है कि हम अपने भीतर और अपने समाज में मौजूद अन्याय को पहचानने का साहस भी रखें। क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है, जब वह मनुष्य की गरिमा, समानता और स्वतंत्रता में भी दिखाई दे।
यही 1919 के अमृतसर अधिवेशन की उन विरासतों में से एक है, जिसे केवल इतिहास की घटना के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र के नैतिक आत्ममंथन के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में भी देखा जा सकता है।

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