महिलाओं के लिए सार्वजनिक शौचालय सुविधा न होना दुर्भाग्यपूर्ण : गरिमा मेहरा दसौनी
एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। अल्मोड़ा के सोमेश्वर क्षेत्र की एक युवती द्वारा सार्वजनिक शौचालय की बदहाल व्यवस्था को लेकर सामने आई पीड़ा ने उत्तराखंड में महिला सुविधाओं के सरकारी दावों की पोल खोल दी है। युवती का कहना है कि अचानक माहवारी आने पर उसे वॉशरूम की आवश्यकता पड़ी, लेकिन सार्वजनिक शौचालय में दरवाजा तक उपलब्ध नहीं था। यह स्थिति किसी भी सभ्य और संवेदनशील समाज के लिए बेहद शर्मनाक है। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि सरकार एक ओर उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश और महिलाओं के लिए सुरक्षित प्रदेश बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन दूसरी ओर हमारी बेटियों और महिलाओं को अपनी सबसे बुनियादी प्राकृतिक जरूरत के लिए भी सार्वजनिक स्थानों पर असुविधा और अपमान का सामना करना पड़ रहा है। गरिमा ने कहा कि यह घटना और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह उस विधानसभा की घटना है जिसकी विधायक स्वयं एक महिला है और उत्तराखंड सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री है कभी पैनिक बटन के नाम पर तो कभी महिला सशक्तिकरण के नाम पर साइकिल रैली निकालने वाली रेखा आर्य की खुद की विधानसभा में अगर बच्चियों को और महिलाओं को शौचालय के लिए भटकना पड़ रहा है तो पूरे राज्य कि क्या हालत होगी? उन्होंने कहा कि कुछ माह पूर्व अल्मोड़ा में एक इजराइली महिला पर्यटक को भी सार्वजनिक महिला शौचालय नहीं मिलने की समस्या सामने आई थी। उस घटना ने देश-दुनिया के सामने उत्तराखंड की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए थे। लेकिन अफसोस है कि उस घटना से भी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया।
गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि मासिक धर्म कोई शर्म की बात नहीं, बल्कि महिलाओं के जीवन का सामान्य जैविक हिस्सा है। ऐसे समय में स्वच्छ, सुरक्षित और गरिमापूर्ण वॉशरूम की सुविधा उपलब्ध कराना सरकार और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है। सार्वजनिक शौचालय केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा और स्वास्थ्य से जुड़ी मूलभूत सुविधा है।
उन्होंने सरकार से मांग की कि—
- उत्तराखंड के सभी प्रमुख बाजारों, बस अड्डों, पर्यटन स्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के लिए अलग, सुरक्षित और स्वच्छ शौचालय तत्काल उपलब्ध कराए जाएं।
- सभी सार्वजनिक महिला शौचालयों में दरवाजे, पानी, सैनिटरी नैपकिन डिस्पेंसर और उचित स्वच्छता व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
- जहां शौचालय बने हुए हैं, वहां उनकी नियमित निगरानी और रखरखाव की व्यवस्था हो।
- बाजारों और पर्यटन स्थलों पर शौचालयों की स्पष्ट साइन बोर्ड एवं लोकेशन व्यवस्था की जाए, ताकि किसी महिला या पर्यटक को उन्हें तलाशने के लिए भटकना न पड़े।
- सरकार इस पूरे मामले की समीक्षा कर महिला-केंद्रित सार्वजनिक स्वच्छता नीति लागू करे।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की बेटियों को अपनी प्राकृतिक जरूरत पूरी करने के लिए दरवाजा खोजने की नौबत आना विकास के तमाम दावों पर बड़ा सवालिया निशान है। सरकार को प्रचार और घोषणाओं से आगे बढ़कर जमीन पर बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करनी होंगी। महिलाओं की गरिमा कोई सुविधा नहीं, उनका अधिकार है।
