देहरादून। लोकनायक बापूजी अणे (डॉ. माधव श्रीहरि अणे) एक महान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद, राजनेता और आधुनिक संस्कृत कवि थे। वे बाल गंगाधर तिलक के प्रमुख अनुयायियों में से एक थे। वे कांग्रेस राष्ट्रवादी पार्टी के संस्थापकों में शामिल थे। उन्होंने 1948 से 1952 तक बिहार के राज्यपाल के रूप में कार्य किया। वे 1962 से 1967 तक लोकसभा के सदस्य रहे। उन्होंने लोकमान्य तिलक के जीवन पर संस्कृत में एक विशाल महाकाव्य लिखा था। शिक्षा के प्रसार के लिए उन्होंने यवतमाल में कई संस्थाओं की नींव रखी। राष्ट्र और समाज के लिए उनकी लंबी सेवाओं के कारण उन्हें देश के प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया था। 29 अगस्त को उनकी जयंती पर उन्हें याद करना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनका जीवन किसी एक क्षेत्र में सीमित नहीं था। वे शिक्षाविद थे, वकील थे, स्वतंत्रता सेनानी थे, राजनेता थे, आधुनिक संस्कृत कवि थे और एक ऐसे विचारक थे, जो लोकप्रिय भावनाओं से प्रभावित होकर अपनी तार्किक सोच नहीं छोड़ते थे। यही कारण था कि महात्मा गांधी भी उनकी शांत और संतुलित सोच का सम्मान करते थे।

माधव श्रीहरि अणे का जन्म 29 अगस्त 1880 को महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में हुआ था। उनका परिवार संस्कृत विद्या और परंपरा से जुड़ा हुआ था। बचपन से ही उन्हें भारतीय शास्त्रों और संस्कृत का अध्ययन करने का अवसर मिला। आगे चलकर यही शिक्षा उनके व्यक्तित्व की बुनियाद बनी। उन्होंने नागपुर के मॉरिस कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद कानून की पढ़ाई की और यवतमाल में वकालत शुरू की। हालांकि, उनके लिए वकालत केवल आजीविका का साधन नहीं थी। सार्वजनिक जीवन के प्रति उनका आकर्षण लगातार बढ़ता गया। वे अदालत में मुकदमे लड़ते थे, लेकिन उनका मन समाज और देश की समस्याओं में लगा रहता था। धीरे-धीरे ब्रिटिश शासन की नीतियों के खिलाफ उनकी आवाज तेज होने लगी। उनके लेखन ने भी उन्हें अंग्रेजी सरकार की नजरों में ला दिया। इस संघर्ष ने आगे चलकर उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी।

बापूजी अणे के राजनीतिक जीवन पर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का गहरा प्रभाव था। तिलक के विचारों ने अणे को यह समझने में मदद की कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक मांग नहीं थी। वह आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना का प्रश्न भी थी। 1911 में उन्होंने तिलक के साथ विदर्भ क्षेत्र का दौरा किया। इस मुलाकात और राजनीतिक निकटता ने उनके विचारों को और मजबूत किया। बाद में वे तिलक के प्रमुख अनुयायियों में गिने गए। तिलक के निधन के बाद भारतीय राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही थी। महात्मा गांधी राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्रीय नेता बन रहे थे। अणे ने बदलते राजनीतिक वातावरण को समझा और गांधी के नेतृत्व को स्वीकार किया। फिर भी उनकी स्वतंत्र सोच बनी रही। वे किसी नेता का समर्थन केवल व्यक्ति के प्रति निष्ठा के कारण नहीं करते थे। उनके लिए विचार और राष्ट्रीय हित अधिक महत्वपूर्ण थे। यही शायद बापूजी अणे के व्यक्तित्व की सबसे दिलचस्प विशेषता थी। वे गांधी का सम्मान करते थे, लेकिन हर मुद्दे पर सहमत होना उनके लिए जरूरी नहीं था। खिलाफत आंदोलन को लेकर उनके विचार कांग्रेस के भीतर कई लोगों से अलग थे। उन्हें लगता था कि राष्ट्रीय एकता के नाम पर किसी भी राजनीतिक समझौते की सीमाएं स्पष्ट होनी चाहिए। वे मानते थे कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा केवल राजनीतिक तुष्टीकरण से नहीं हो सकती। उनके विचारों में बहुमत की सद्भावना को भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। यह सोच उस समय के राजनीतिक वातावरण में काफी स्पष्ट और विवादास्पद थी। फिर भी उन्होंने अपनी बात रखने से परहेज नहीं किया।

महात्मा गांधी उनकी इसी तार्किकता और स्पष्ट सोच का सम्मान करते थे।  1918 में उन्होंने होम रूल लीग से जुड़कर सक्रिय राजनीतिक कार्य शुरू किया। इसी दौर में उन्होंने यवतमाल से ‘लोकमत’ नामक समाचार पत्र शुरू किया। यह केवल अखबार नहीं था। यह क्षेत्रीय समाज में राजनीतिक जागरूकता फैलाने का माध्यम भी बना। बाद में यह अखबार एक बड़े मीडिया संस्थान के रूप में विकसित हुआ। अणे शिक्षा के महत्व को भी समझते थे। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब समाज शिक्षित और जागरूक होगा। इसी सोच के तहत उन्होंने यवतमाल में शिक्षा संस्थान स्थापित करने में योगदान दिया। 1928 में न्यू इंग्लिश हाई स्कूल की स्थापना उनके शैक्षणिक प्रयासों का उदाहरण बनी। बाद में यह संस्थान उनके नाम से जाना गया। साहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। 1923 में विदर्भ साहित्य संघ की स्थापना और महाराष्ट्र साहित्य जगत में उनकी भूमिका उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाती है।

1930 में महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह से देश के विभिन्न हिस्सों में सविनय अवज्ञा की लहर फैल रही थी। विदर्भ में भी अंग्रेजी वन कानूनों के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा था। जंगलों पर ब्रिटिश नियंत्रण ने स्थानीय लोगों के पारंपरिक अधिकारों को प्रभावित किया था। इसी पृष्ठभूमि में बापूजी अणे ने वन सत्याग्रह का नेतृत्व किया। 10 जुलाई 1930 को उन्होंने स्वयंसेवकों के साथ यवतमाल जिले के पुसद क्षेत्र के आरक्षित जंगल में जाकर घास काटी। ब्रिटिश कानून के अनुसार यह अपराध माना गया। अणे गिरफ्तार कर लिए गए। उन पर वन उत्पाद की चोरी का आरोप लगाया गया। अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और छह महीने की जेल की सजा सुनाई। लेकिन ब्रिटिश सरकार शायद यह समझ नहीं पाई थी कि जेल की सजा उनके प्रभाव को कम नहीं करेगी। इसके बाद जनता ने उन्हें सम्मान से ‘लोकनायक’ कहना शुरू कर दिया। वन सत्याग्रह के बाद आंदोलन केवल अणे तक सीमित नहीं रहा। विदर्भ और मध्य प्रांतों के कई हिस्सों में इसका प्रभाव दिखाई दिया। स्थानीय लोगों और आदिवासी समुदायों ने भी इसमें भाग लिया। अणे का संघर्ष अब व्यापक जनआंदोलन का हिस्सा बन चुका था। वे कई बार जेल गए। उनकी वकालत भी राजनीतिक गतिविधियों के कारण प्रभावित हुई। ब्रिटिश सरकार ने उनकी कानून की सनद तक रद्द कर दी थी। लेकिन यवतमाल के वकीलों ने उनका साथ नहीं छोड़ा। जब वे जेल से बाहर आते और अदालत में काम करते, तो स्थानीय वकील उन्हें अपने मुकदमों के ब्रीफ देते थे। इससे उन्हें आर्थिक सहारा मिलता था। उनके प्रति समाज का यह सम्मान बताता है कि उनका प्रभाव केवल राजनीतिक मंच तक सीमित नहीं था। उनके अपने शहर में लोगों ने उन्हें परिवार के सदस्य की तरह स्वीकार किया था।

1928-29 के दौरान बापूजी अणे ने नेहरू समिति के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में बनी समिति ने भारत के संवैधानिक भविष्य पर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट तैयार की। जवाहरलाल नेहरू इसके सचिव थे। अणे भी समिति के प्रमुख सदस्यों में शामिल थे। यह दौर भारतीय नेताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। देश के भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था पर गंभीर चर्चा चल रही थी। अणे इस बहस का हिस्सा बने। 1931 में वे कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य बने। इसके बाद 1933 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। यह उनके राजनीतिक जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक थी। वे केवल आंदोलनकारी नहीं थे। वे संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था को समझने वाले गंभीर राजनेता भी थे। 1941 में उन्हें वायसराय की कार्यकारी परिषद में शामिल किया गया। उन्हें विदेशों में रहने वाले भारतीयों और राष्ट्रमंडल संबंधों से जुड़ा दायित्व दिया गया। यह भूमिका ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर थी। फिर भी जब राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं, अणे ने अपना रुख स्पष्ट रखा। 1942 में महात्मा गांधी के उपवास और उनकी रिहाई की मांग के समर्थन में उन्होंने वायसराय की परिषद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1943 से 1947 तक वे सीलोन में भारत के हाई कमिश्नर रहे।

स्वतंत्रता के समय उनका अनुभव भारत के लिए महत्वपूर्ण था। आजादी के बाद वे संविधान निर्माण की प्रक्रिया से भी जुड़े। इस तरह उनका सार्वजनिक जीवन ब्रिटिश भारत से स्वतंत्र भारत तक फैला हुआ था। स्वतंत्र भारत में 12 जनवरी 1948 को बापूजी अणे बिहार के राज्यपाल बने। उन्होंने जून 1952 तक इस पद पर कार्य किया। पटना की एक प्रमुख सड़क आज भी उनके नाम से जुड़ी हुई है। लेकिन राज्यपाल पद के बाद भी उनका मन विदर्भ की समस्याओं से अलग नहीं हुआ। 1952 में उन्हें गंभीर स्वास्थ्य संकट का सामना करना पड़ा। रीढ़ की तपेदिक के कारण वे लंबे समय तक बिस्तर पर रहे। कई महीनों तक उन्हें प्लास्टर में रहना पड़ा। उनकी बीमारी वर्षों तक चली। इसके बावजूद उनका सार्वजनिक जीवन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। यही उनके व्यक्तित्व की अद्भुत दृढ़ता थी। जब राज्य पुनर्गठन का प्रश्न उठा, तब बापूजी अणे ने अपनी बीमारी को अपने विचारों के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया।

1954 में उन्होंने विदर्भ के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर विस्तृत ज्ञापन प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने विदर्भ के इतिहास, भूगोल, अर्थव्यवस्था और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर अलग राज्य की मांग रखी। राज्य पुनर्गठन आयोग ने भी विदर्भ को अलग राज्य बनाने की सिफारिश की थी। हालांकि, 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद अलग विदर्भ राज्य नहीं बनाया गया। इसके बाद अणे और ब्रिजलाल बियाणी ने नाग-विदर्भ आंदोलन को संगठित किया। यहां एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। उम्र बढ़ चुकी थी। स्वास्थ्य कमजोर था। फिर भी उनका राजनीतिक संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था। 1959 में बापूजी अणे ने नागपुर लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतकर संसद में वापसी की। लेकिन 1962 का चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का एक बेहद दिलचस्प अध्याय बना। उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। इसके बजाय उन्होंने नाग विदर्भ आंदोलन समिति के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। उन्होंने नागपुर सीट पर जीत दर्ज की। उस चुनाव में जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार करने नागपुर पहुंचे थे। फिर भी उन्होंने सार्वजनिक मंच से अणे के खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणी करने से परहेज किया। यह प्रसंग दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेदों के बावजूद मौजूद सम्मान को दिखाता है।

अणे 1962 से 1967 तक लोकसभा के सदस्य रहे। उनकी राजनीति में पार्टी से ज्यादा विचार और क्षेत्रीय हित महत्वपूर्ण रहे। बापूजी अणे की पहचान केवल राजनेता या स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नहीं थी। वे संस्कृत के विद्वान और कवि भी थे। उन्होंने संस्कृत में बाल गंगाधर तिलक की जीवनी ‘श्रीतिलकयशोर्णव’ लिखी। उनकी साहित्यिक प्रतिभा को मरणोपरांत 1973 में संस्कृत के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके जीवन में भारतीय परंपरा और आधुनिक राजनीतिक विचारों का एक अनोखा मेल दिखाई देता है। वे एक ओर वैदिक और संस्कृत परंपरा से जुड़े थे। दूसरी ओर वे आधुनिक शिक्षा, पत्रकारिता, संवैधानिक राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं में सक्रिय थे। यही मिश्रण उनके व्यक्तित्व को अपने समय के कई नेताओं से अलग बनाता है।

बापूजी अणे का निधन 26 जनवरी 1968 की शाम गंभीर हृदयाघात के कारण हुआ। संयोग देखिए कि उसी दिन उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। एक लंबी सार्वजनिक यात्रा का अंत उसी दिन हुआ, जिस दिन राष्ट्र ने उनके योगदान को औपचारिक सम्मान दिया।
लोकनायक बापूजी अणे (माधव श्रीहरि अणे) एक महान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद और राजनीतिज्ञ थे।
परिचय और जन्म
पूरा नाम : डॉ. माधव श्रीहरि अणे (बापूजी अणे)
जन्म: 29 अगस्त 1880, वणी, यवतमाळ जिला, महाराष्ट्र।
निधन: 26 जनवरी 1968।
उपाधि: उन्हें जनता ने ‘लोकनायक बापूजी’ (जन नेता और आदरणीय पिता) की उपाधि दी थी।
शिक्षा और शुरुआती जीवन
बापूजी अणे के पिता श्रीहरी अणे एक विद्वान व्यक्ति थे। उन्होंने नागपुर के मॉरिस कॉलेज से बी.ए. और कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून (एल.एल.बी.) की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने वकालत शुरू की।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
वे लोकमान्य बापूजी अणे बाल गंगाधर तिलक के प्रमुख अनुयायियों में से एक थे। उन्होंने नमक सत्याग्रह और ब्रिटिश सरकार के अन्याय पूर्ण वन नियमों के खिलाफ ‘वन सत्याग्रह’ में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने कांग्रेस राष्ट्रवादी पार्टी की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। 1941 में वे वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य बने, लेकिन महात्मा गांधी के समर्थन में 1943 में पद से इस्तीफा दे दिया।
प्रमुख पद और सम्मान
श्रीलंका में उच्चायुक्त: वे 1943 से 1947 तक श्रीलंका में भारत के उच्चायुक्त रहे।
संविधान सभा सदस्य: देश की आजादी के बाद वे संविधान सभा के सदस्य चुने गए।
बिहार के राज्यपाल: उन्होंने 1948 से 1952 तक बिहार के राज्यपाल के रूप में कार्य किया।
लोकसभा सांसद: वे 1962 से 1967 तक लोकसभा के सदस्य रहे।

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