परमार्थ निकेतन विश्व को पर्यटन नहीं, दे रहा है तीर्थाटन का अनुभव

एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में थाइलैंड से पर्यटकों का एक दल आया। उन्होंने परमार्थ पीठाधीश्वर, स्वामी चिदानन्द सरस्वती से भेंट कर अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं एवं प्रश्नों का समाधान प्राप्त किया।

दुनिया के अलग-अलग देशों से लोग समय-समय पर ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन आते हैं। कोई अपने भीतर उठ रहे प्रश्नों के उत्तर खोजने आता है, कोई जीवन के लक्ष्य को समझने, कोई मन की अशांति को शांत करने और कोई परिवार, समाज, प्रकृति तथा समस्त मानवता के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने की जिज्ञासा लेकर आता है। प्रश्न अलग-अलग होते हैं, भाषाएँ अलग होती हैं, जीवन-शैलियाँ अलग होती हैं, लेकिन भीतर की तलाश एक ही होती है—शांति की, सत्य की और अपने वास्तविक स्वरूप को जानने की।

माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन उन्हें केवल एक स्थान नहीं, बल्कि स्वयं से मिलने का अवसर देता है। हिमालय की गोद में बसा उत्तराखंड का सुरम्य वातावरण, माँ गंगा की कल-कल धारा, मंदिरों की घंटियाँ, मंत्रों की गूँज, साधना की शांति और भारतीय संस्कृति की आत्मीयता हर आगंतुक के मन को सहज ही स्पर्श करती है। गंगा तट पर कुछ क्षण बैठते ही बाहरी दुनिया का कोलाहल शांत होने लगता है और भीतर की विचार-धारा भी निर्मल होने लगती है।

परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह केवल बाहरी उत्तर नहीं देती, बल्कि व्यक्ति को अपने भीतर उतरने की प्रेरणा देती है। जीवन में प्रश्न होना स्वाभाविक है, लेकिन उन प्रश्नों के साथ भीतर की यात्रा प्रारंभ करना ही साधना है।

परमार्थ निकेतन इसी आंतरिक यात्रा का एक पवित्र पड़ाव है। यहाँ योग, ध्यान और वेदान्त की कक्षाएँ जीवन को देखने की नई दृष्टि प्रदान करती हैं। योग शरीर और मन के संतुलन की ओर ले जाता है, ध्यान भीतर की शांति से जोड़ता है और वेदान्त स्वयं, संसार और जीवन के मूल प्रश्नों पर चिंतन की दृष्टि देता है।

प्रतिदिन संध्या की अनुपम बेला में पूज्य स्वामी जी एवं साध्वी जी के पावन सान्निध्य में माँ गंगा के तट पर होने वाली दिव्य गंगा आरती इस आध्यात्मिक यात्रा को और भी अलौकिक बना देती है। दीपों की ज्योति, मंत्रों की गूँज और माँ गंगा की पावन धारा के बीच देश-विदेश से आए साधक स्वयं को एक विराट आध्यात्मिक परिवार का हिस्सा अनुभव करते हैं।

परमार्थ निकेतन आने वाले साधक अपने साथ प्रश्न लेकर आते हैं और अक्सर अपने भीतर नए संकल्प लेकर लौटते हैं। यहाँ की दिव्यता, पवित्रता और आत्मीयता मन को गहराई से स्पर्श करती है।

पूज्य स्वामी जी का संदेश है कि भारत आने वाला प्रत्येक अतिथि भारत को केवल देखे नहीं, भारत को अनुभव करे। माँ गंगा के प्रति श्रद्धा को समझे, प्रकृति के प्रति अपने दायित्व को पहचाने, योग से संतुलन पाए, ध्यान से शांति पाए और भारतीय संस्कृति के माध्यम से ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा करे। परमार्थ निकेतन का यही प्रयास है कि विश्वभर से आने वाले अतिथि यहाँ से केवल स्मृतियाँ लेकर न लौटें, बल्कि शांति, सेवा, संस्कार और सद्भावना का संदेश लेकर लौटें।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *