दशलक्षण महापर्व के नौवें दिन की गई उत्तम आकिंचन धर्म की आराधना

संदीप गोयल/एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस

देहरादून। पर्वाधिराज पर्युषण दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर आध्यात्मिक श्रमणी परम पूज्य वात्सल्यमयी आर्यिका रत्न श्री 105 पूर्णमति माताजी ससंघ के पावन सान्निध्य में देहरादून के गांधी रोड स्थित श्री दिगम्बर जैन पंचायती मंदिर सहित शहर के विभिन्न जैन मंदिरों में दशलक्षण महापर्व भव्य एवं धार्मिक वातावरण संगीतमय भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। दशलक्षण महापर्व के तहत गुरुवार को उत्तम अकिंचन धर्म के मौके पर जैन समाज ने प्रातः 6 बजे प्रभात फेरी जैन भवन से त्यागी रोड होते हुए श्री वर्णी जैन विद्यालय वाली गली से जैन भवन मुख्य द्वार तक निकली। शहर में कई जगह धर्मप्रेमियों ने प्रभात फेरी का स्वागत किया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान के जयकारे लगाकर धार्मिक माहौल बनाया। जिसमें प्रातःकाल मंदिरों में नित्य नियम पूजन एवं दशलक्षण पूजन सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। इसके साथ ही आयोजित भव्य आत्मबोध संस्कार शिविर में देहरादून के साथ-साथ विभिन्न स्थानों से आए श्रद्धालु बढ़-चढ़कर सहभागिता कर रहे हैं। इस अवसर पर पूज्य आर्यिका पूर्णमति माताजी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि उत्तम आकिंचन धर्म जैन धर्म के दशलक्षण महापर्व का नौवां महत्वपूर्ण धर्म है, जिसका अर्थ है किंचित मात्र भी (यानी थोड़ा सा भी) बाहरी पदार्थ या परिग्रह मेरा नहीं है।उत्तम आकिंचन धर्म का अर्थअकिंचनता: इसका शाब्दिक अर्थ है-बाहरी वस्तुओं, धन, संपत्ति और मोह-माया से पूरी तरह मुक्त या खाली होना। आत्मा का स्वरूप: इस धर्म के अनुसार, इस संसार में आत्मा के अपने ज्ञान और गुणों के अलावा कोई भी अन्य वस्तु (शरीर, मकान, परिवार आदि) उसकी अपनी नहीं है। परिग्रह का त्याग: वस्तुओं के प्रति मोह या मूर्छा ही परिग्रह है। जब मनुष्य बाहरी चीजों में अपना सुख ढूंढना बंद कर देता है, तब वह वास्तविक आकिंचन धर्म की ओर बढ़ता है।पालन और महत्वपूर्ण पालन: दिगंबर मुनिराज इस धर्म का पूर्ण रूप से पालन करते हैं क्योंकि उनके पास रंचमात्र भी बाहरी परिग्रह या वस्त्र आदि नहीं होते।गृहस्थ जीवन में: साधारण लोग अपनी अनावश्यक वस्तुओं का त्याग कर और मोह को घटाकर इस धर्म के आंशिक स्वरूप को अपने जीवन में अपना सकते हैं।मुक्ति का मार्ग: जिस प्रकार पर्वत की चोटी पर हल्का होकर ही चढ़ा जा सकता है, उसी प्रकार आत्मा को ऊंचाइयों (मोक्ष) तक ले जाने के लिए अहंकार और परिग्रह के भार से मुक्त होना आवश्यक है। आज दोपहर 2:00 बजे महिला जैन मिलन द्वारा मंगलाचरण किया गया। रात्रि 8:30 बजे प्रेरणादायक नाटिका प्रभु समर्पण समिति द्वारा आयोजित की गई। आत्मबोध संस्कार शिविर के अंतर्गत आचार्य भक्ति, सामायिक, शंका समाधान, प्रतिक्रमण, जैन धर्म पर मार्मिक प्रवचन, तत्त्वार्थ सूत्र का अध्ययन, महाआरती, दस धर्मों पर प्रवचन, ‘द आर्ट ऑफ सेल्फ-डिस्कवरी’ ध्यान शिविर तथा प्रश्न मंच सहित विभिन्न आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। ध्यान शिविर में बा.ब्र. ऋतु दीदीजी ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन एवं आत्म-अन्वेषण के लिए प्रेरित किया।

कार्यक्रम की जानकारी देते हुए मीडिया कोऑर्डिनेटर मधु जैन ने बताया कि भव्य शोभायात्रा प्रातः 11 बजे जैन भवन गाँधी रोड से तीर्थंकर महावीर चौक, झंडा बाजार, अखाडा बाजार, मोती बाजार, मिशन सरनीमल बाजार, धामावाला, राजा रोड होते हुए जैन भवन पर सम्पन्न होगी। इस अवसर पर जैन समाज, श्री विद्या-समय-पूर्ण वर्षायोग समिति, जैन भवन कार्यकारिणी सहित विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारी, सदस्यगण एवं बड़ी संख्या में बाहर से आए श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी श्रद्धालुओं ने पूज्य माताजी के पावन सान्निध्य में धर्मलाभ प्राप्त किया।

 

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