भारत के सच्चे सपूत नेताजी सुभाषचन्द्र बोस : अनन्त आकाश
अनन्त आकाश
देहरादून, 23 जनवरी। सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक गौरवशाली और स्वर्णिम अध्याय है। यह एक ऐसी सैन्य और राजनीतिक यात्रा है, जो विश्वयुद्ध के दौरान अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर लड़ी गई और जिसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज का “दिल्ली चलो” का सफर भले ही सैन्य रूप से सफल न हो सका, लेकिन इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। इसने भारतीयों के मन में स्वतंत्रता की अदम्य इच्छा जगाई और यह साबित कर दिया कि भारतीय सैनिक ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ हथियार उठा सकते हैं। आजाद हिंद फौज का बलिदान और सुभाष चंद्र बोस का नेतृत्व भारतीय इतिहास में सदैव अमर रहेगा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रमुख नेता थे, लेकिन गांधीजी की अहिंसक नीतियों से मतभेद के कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। उनका मानना था कि “आजादी भीख में नहीं मिलती, छीननी पड़ती है” और अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के लिए सशस्त्र संघर्ष आवश्यक है। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नजरबन्द कर दिया था, लेकिन जनवरी 1941 में, एक सुनियोजित योजना के तहत, वह अपने घर से भाग निकले और अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी पहुंचे। आजाद हिंन्द फौज की स्थापना पहली बार मोहन सिंह ने की थी, लेकिन बाद में यह विघटित हो गई। सुभाष चंद्र बोस ने इसका दूसरा और वास्तविक रूप से पुनर्गठन किया।
(1) जापान पहुंचना: जर्मनी में हिटलर से मिलने के बाद, सुभाष ने महसूस किया कि भारत को आजाद कराने का असली मौका जापान के साथ है। वह 1943 में एक जर्मन पनडुब्बी से जापान की यात्रा पर निकले।
(2) सिंगापुर पहुंचना: 2 जुलाई, 1943 को सुभाष सिंगापुर पहुंचे, जो उस समय जापान के कब्जे में था।
(3) आजाद हिंद फौज का पुनर्गठन: 4 जुलाई, 1943 को सिंगापुर के कैथे सिनेमा हॉल में एक विशाल रैली में, सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज की कमान संभाली। उन्होंने रास बिहारी बोस से आजाद हिंद फौज की कमान ली।
(4) इसी रैली में सुभाष ने अपना प्रसिद्ध नारा दिया – “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा!” यह नारा इतना प्रभावशाली था कि हजारों लोग आजाद हिन्द फौज में शामिल हो गए।
(5) 21 अक्टूबर, 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में “आजाद हिन्द सरकार” (अस्थाई सरकार भारत) की स्थापना की। इस सरकार को जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, इटली, चीन और आयरलैंड सहित 9 देशों ने मान्यता दी। इस सरकार ने अपने सिक्के और डाक टिकट भी जारी किए।
(6) आजाद हिंद फौज के सैनिकों और भारतीयों के मन में जोश भरने और उनका लक्ष्य स्पष्ट करने के लिए सुभाष चंद्र बोस ने “दिल्ली चलो” (On to Delhi) का ऐतिहासिक नारा दिया। यह नारा उनकी रणनीति और दृष्टि को दर्शाता था – लाल किले पर तिरंगा फहराना और दिल्ली पर कब्जा करना।
(7) आजाद हिंद फौज, जापानी सेना के सहयोग से, बर्मा (म्यांमार) के रास्ते भारत की पूर्वी सीमा में प्रवेश करने के लिए अग्रसर हुई।
(8) INA ने भारतीय भूमि पर पहला झंडा 18 मार्च, 1944 को मणिपुर के मोइरंग में फहराया। इस दिन को आज भी मोइरंग दिवस के रूप में मनाया जाता है।
(9) INA ने इंफाल और कोहिमा की लड़ाइयों में ब्रिटिश सेना के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी।
· हालांकि, जापानी सहयोग की (10)कमजोरी, रसद की कमी और मौसम की विषम परिस्थितियों के कारण INA की सेना को पीछे हटना पड़ा।
द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के साथ ही आजाद हिंद फौज का अभियान विफल हो गया।
(11) सुभाष चंद्र बोस 18 अगस्त, 1945 को एक विमान दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गए और उनकी मृत्यु की खबर आई (हालांकि उनकी मृत्यु आज भी एक रहस्य बनी हुई है)।
ब्रिटिश सरकार ने आजाद हिंद फौज के अधिकारियों पर लाल किले में मुकदमा चलाया। शाहनवाज खान, प्रेम सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लon पर मुकदमा चला, जिसने पूरे भारत में आक्रोश पैदा कर दिया।
(12) यह मुकदमा ब्रिटिश सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक गलती साबित हुई। पूरे देश में INA के बचाव में आवाज उठने लगी और भारतीय सेना में भी असंतोष फैल गया। इसने भारत की आजादी की प्रक्रिया को तेज कर दिया।
सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज का “दिल्ली चलो” का सफर भले ही सैन्य रूप से सफल न हो सका, लेकिन इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। इसने भारतीयों के मन में स्वतंत्रता की अदम्य इच्छा जगाई और यह साबित कर दिया कि भारतीय सैनिक ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ हथियार उठा सकते हैं। आजाद हिंद फौज का बलिदान और सुभाष चंद्र बोस का नेतृत्व भारतीय इतिहास में सदैव अमर रहेगा।
