उत्तरायणी कौथिक महोत्सव के अंतिम दिन देखने को मिला परंपराओं का जीवंत संगम

एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस

देहरादून 08 फरवरी। देहरादून में सेवा संकल्प फाउंडेशन द्वारा आयोजित उत्तरायणी कौथिक महोत्सव के अंतिम दिन लोक संस्कृति, लोक कला और परंपराओं का ऐसा जीवंत संगम देखने को मिला, जिसने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। रंगारंग प्रस्तुतियों के बीच उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत केवल मंच पर नहीं, बल्कि हर दर्शक के हृदय में जीवंत होती नजर आई।

कार्यक्रम में कृषि आधारित “दो बैलों की जोड़ी” की प्रस्तुति ने ग्रामीण जीवन, परिश्रम और परंपरागत खेती की यादें ताज़ा कर दीं। लोकगायिका रिंकू राणा जी ने थारू जनजाति पर आधारित गीतों के माध्यम से जनजातीय संस्कृति की आत्मा को स्वर दिया। छात्रों द्वारा म्यूजिक योगा की प्रस्तुति ने योग के महत्व को नई पीढ़ी की रचनात्मक अभिव्यक्ति से जोड़ा। लोक गायक मनमोहन बटकोरा जी और दानपुर घाटी सांस्कृतिक दल की प्रस्तुतियों ने वातावरण को लोक रंग में सराबोर कर दिया। मांटेसरी स्कूल के छात्रों द्वारा गंगा अवतरण पर आधारित कार्यक्रम ने आध्यात्मिक भावनाओं को छू लिया। इस अवसर पर मातृशक्ति द्वारा पारंपरिक रूप से नींबू सानने की परंपरा ने लोक रीति-रिवाजों की आत्मीयता को सजीव कर दिया।

विभिन्न प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया, साथ ही समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तित्वों का भी सम्मान किया गया। महोत्सव स्थल पर लगे हस्तशिल्प एवं स्थानीय उत्पादों के स्टॉल स्थानीय कारीगरों और शिल्पकारों के लिए आत्मनिर्भरता का माध्यम बने। अपने हाथों की कला को प्रदर्शित करते हुए उनके चेहरे पर संतोष और गर्व स्पष्ट झलक रहा था।

उत्तरायणी कौथिक महोत्सव केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति, परंपराओं, जनजागरूकता, स्थानीय प्रतिभाओं के सम्मान और स्वरोज़गार को बढ़ावा देने की दिशा में एक भावनात्मक और प्रेरणादायी पहल के रूप में उभरकर सामने आया, जिसने सभी को अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया।

 

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