तिलवाड़ा की फैक्ट्री को ‘भण्डारण’का नाम देकर वहाँ ‘कॉटेज’और ‘रिज़ॉर्ट’बना दिया
अनन्त आकाश /एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। उत्तराखण्ड की चीड़ की सुगंध और मन्दाकिनी की कलकल के बीच बसा तिलवाड़ा आज अपने आप में एक करारा सवाल बनकर खड़ा है। यह वही तिलवाड़ा है, जहाँ कभी ग्रामीणों ने ‘विकास’ के नाम पर अपनी ज़मीन मुफ्त दे दी थी। तब यहाँ लीसा और विरोजा की फैक्ट्री धड़कती थी–चीड़ के राल से सरकारी खजाना भरता था, और सैकड़ों पहाड़ी परिवारों की रोज़ी चलती थी। आज वही परिसर मन्दाकिनी रिज़ॉर्ट’ कहलाता है। पर यहाँ सुनहरी चादरों के नीचे वही सन्नाटा है, जो बेरोज़गार युवाओं के सपनों को कुचल गया। चकाचौंध भरी इस तस्वीर के पीछे एक ऐसी विडंबना है, जिसे आँखें बन्द करके नहीं देखा जा सकता। 1980-90 के दशक में तिलवाड़ा जीएमवीएन की सबसे चमकती इकाई थी। सटीक लाभ के आँकड़े भले सार्वजनिक न हों, पर गाँव के बुज़ुर्ग आज भी बताते हैं – “तब हमारे घरों में रोटी पकती थी, बच्चे स्कूल जाते थे, लड़कियों की शादी में सोचनी-विचारनी नहीं होती थी।” 50-100 स्थायी-अस्थायी परिवारों का हर परिवार से कोई न कोई इस फैक्ट्री से जुड़ा था। इसके अलावा सैकड़ों राल संग्रहकर्ता, ठेकेदार, दिहाड़ी मज़दूर। यह एक जीवन्त श्रृंखला थी–जंगल से फैक्ट्री, फैक्ट्री से मण्डी, मण्डी से सरकारी कोष,यह सिर्फ नौकरी नहीं थी। यह पहाड़ पर गर्व था। गाँव की सांस थी। आज रिसॉर्ट की दीवारों के भीतर बेरोज़गारी का कोहराम है. आज जीएमवीएन पर्यटन पर फोकस करता है – 90 से अधिक गेस्ट हाउस, 1200 कर्मचारी। तिलवाड़ा की फैक्ट्री को ‘भण्डारण’ का नाम देकर वहाँ ‘कॉटेज’ और ‘रिज़ॉर्ट’ बना दिया गया। यह बदलाव कोई योजना नहीं, बल्कि एक चुपचाप किया गया सर्जिकल स्ट्राइक है–औद्योगिक धरोहर पर, ग्रामीणों के विश्वास पर।
तीन सवाल जो केदारघाटी में गूँजते हैं:-
- ज़मीन दान की थी फैक्ट्री के लिए – रिसॉर्ट कैसे बना? स्थानीय समुदाय ने विकास के लिए ज़मीन दी थी, मनोरंजन के लिए नहीं। 2025-26 की उत्तराखण्ड पर्यटन नीति ने बिना औपचारिक परिवर्तन इको-रिसॉर्ट की इजाजत दे दी। पर क्या यह कानूनी झोल नहीं? और क्या यह उन लोगों के साथ नैतिक धोखा नहीं, जिन्होंने अपनी जमीन दी, समाज के हित के लिये ?
- रोज़गार कहाँ है? पहले जहाँ सैकड़ों मज़दूर राल बेचकर रोटी कमाते थे, अब रिसॉर्ट में महज़ 5-10 स्टाफ तैनात हैं। बाकी इस जमीन के असली मालिक सब बेरोज़गार। युवा देहरादून, ऋषिकेश, दिल्ली की ओर पलायन कर चुके हैं। जिन बुजुर्गो ने ज़मीन दान की, वे आज अपने पोते-पोतियों को पलायन करते हुऐ देख रहे हैं – क्योंकि उनके बच्चे शहर की सड़कों पर डिलीवरी बॉय बन चुके हैं।
- ‘भू-कानून’ आन्दोलन का नया चेहरा? अन्य जगह की भांति केदारघाटी पूरे उत्तराखण्ड के भू-कानून आंदोलन की जमीन है। क्योंकि हर जगह, हर गाँव यही कहता है – “हमने ज़मीन दी तो विकास के लिए दी, रिज़ॉर्ट के लिए नहीं। हमारे बच्चे अब मजदूरी करने शहर जाते हैं, और हमारी का ज़मीन का उपयोग कुछ और ही हो रहा है।”
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि 50 साल पहले “हमने जब ज़मीन दी थी, तो सरकार ने कहा–फैक्ट्री खुलेगी, तुम्हारे लड़कों को नौकरी मिलेगी।फैक्ट्री खुली खूबसारा रोजगार मिला, सरकार को मुनाफा हुआ, बजाय फैक्ट्री चलाने तथा वहाँ और अधिक रोजगार बढाने के लिए चलती फिरती फैक्ट्री बडे लोगों के हित के अनुरूप बन्द कर दी, और खोल दिया रिजोर्ट!आज स्थानीय लोग रोजगार के लिए दर दर भटक रहें, और हमारी ही ज़मीन पर फाइव-स्टार जैसा रिसॉर्ट खुल गया है। क्या इंसाफ है?”
स्थानीय युवा कहते हैं: “हमें पढ़ा-लिखा बेरोज़गार बनाकर कॉटेज के नाम पर सरकार ने बाहरी निवेशकों को तोहफा दे दिया। अब हम भू-कानून की माँग क्यों न करें?” यह एक बन्द फैक्ट्री की कहानी नहीं, एक धोखे की तारीख है. तिलवाड़ा की लीसा फैक्ट्री अब केवल सरकारी रिकॉर्ड में एक ‘बंद इकाई’ भर है। पर हकीकत में यह उत्तराखण्ड के उस बदलाव की दास्तान है, जहाँ ‘विकास’ के नाम पर गाँव लूटे गए, और ‘रिज़ॉर्ट’ की रौनक ने बेरोज़गारी को नई कीमत दे दी।
अब सवाल यह है – क्या जीएमवीएन पुरानी फैक्ट्री को दोबारा खोल सकता है,या फिर नये रोजगार सृजन हो सकते हैं ? क्या राल प्रसंस्करण को नई तकनीक से जीवित किया जा सकता है? या फिर यह परिसर हमेशा पर्यटकों के ‘स्टे’ के लिए चमकता रहेगा, और गाँव के लोग सिर्फ इस चमक के दर्शक बने रहेंगे?
केदारघाटी के ग्रामीण अब केवल इंतज़ार नहीं कर रहे। वे आवाज़ बनेंगे, और यह आवाज़ सरकार व कानून के दरवाज़े खटखटाएगी – उसी न्याय के लिए, जिसके भरोसे उन्होंने कभी ज़मीन दान की थी। लेखक अनन्त आकाश सीपीआई (एम) देहरादून के सचिव हैं.
