बिल्कुल उलट दिखती है तस्वीर
लेखक: अनन्त आकाश
देहरादून। भारत को अक्सर दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और सशक्त विदेश नीति का उदाहरण देकर गर्वित कराया जाता है। लेकिन जब आप पेट्रोल पंप पर लाइन में खड़े होते हैं, किसान की झोपड़ी में बात करते हैं, या छोटे कारोबारी की दुकान पर हालचाल पूछते हैं-तो तस्वीर बिल्कुल उलट दिखती है। यह लेख किसी दल का बचाव या विरोध नहीं करता। यह उन जमीनी नुकसानों का ईमानदार बयान है, जिनकी जड़ें अमेरिकी दबाव में ली गई विदेश नीतियों से जुड़ी हैं।
ऊर्जा संकट : सस्ता तेल जो हाथ नहीं आया
आज पेट्रोल 100 प्रति लीटर के पार है। रसोई गैस का सिलेंडर 800 से बढ़कर 1,100 के आसपास पहुँच चुका है। ट्रक ड्राइवर सड़कों पर उतरे, होटल व्यवसायियों ने मोर्चा थामा, मजदूरों का पलायन हुआ। मध्यम वर्ग के घरों में गैस बिल अब बजट से बाहर हो गया है। लाखों औद्योगिक एवं निर्माण मजदूरों के साथ-साथ मध्यम वर्गीय परिवार भी अपने घर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। पेट्रोलियम पदार्थों की कालाबाजारी चरम पर है, जबकि सरकार जनता को नसीहत दे रही है-खर्चा कम करो, कम खाओ, सोना मत खरीदो। यह सिर्फ महँगाई नहीं है-यह नीति का नतीजा है।
यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोप ने रूसी तेल पर मूल्य सीमा (price cap) लगा दी। भारत को रूस से छूट पर तेल खरीदने के लिए अमेरिकी बैंकिंग और बीमा प्रणाली की अनुमति चाहिए थी। भारत ने रूसी तेल तो खरीदा, लेकिन पूरी क्षमता से नहीं-अमेरिकी दबाव में ‘पर्याप्त छूट’ नहीं ली जा सकी। यदि भारत चीन या रूस की तरह अमेरिकी नियमों को अनदेखा कर सस्ता तेल खरीदता, तो आज पेट्रोल 70 में उपलब्ध होता। यह अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि रूसी तेल और अंतरराष्ट्रीय बाजार के अंतर का सीधा गणित है। हर बार जब आप बाइक में पेट्रोल डलवाते हैं, तो आप अमेरिकी विदेश नीति का कुछ अंश चुका रहे होते हैं।
चाबहार से मुँह मोड़ना: बंदरगाह अधूरा, बाजार सिकुड़े :- भारत ने ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह में अरबों रुपये लगाए थे। यह पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए सीधा मार्ग था। लेकिन अमेरिकी दबाव में भारत ने ईरान से तेल आयात लगभग बंद कर दिया और ईरान-विरोधी गुट (इज़राइल, यूएई, सऊदी अरब) से हाथ मिलाए। परिणाम यह हुआ कि चाबहार पर कंटेनर ट्रैफिक 80% से अधिक घट गया। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह, जिसे चीन विकसित कर रहा है, ने अफगानिस्तान तक पहुँचने की होड़ जीत ली।
इसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ा। उन्हें मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए लंबा और महँगा रास्ता अपनाना पड़ता है। भारतीय चाय, दवाएँ, मशीनरी के लिए नए बाजार सिकुड़ गए। और इसका आखिरी असर रोजगार और विदेशी मुद्रा पर पड़ता है।
खाड़ी देशों में फंसे 1 करोड़ भारतीयों की रोज़ी पर संकट :- सरकार की डगमगाती विदेश नीति का एक और बड़ा खामियाजा खाड़ी देशों में काम करने वाले लगभग 1 करोड़ भारतीयों को भुगतना पड़ रहा है। ईरान के साथ संबंधों में गिरावट और अमेरिका समर्थित अरब देशों के साथ बढ़ते तालमेल के बावजूद, खाड़ी में भारतीय श्रमिकों के लिए रोजगार के अवसर घट रहे हैं। वीजा नीतियाँ सख्त हो रही हैं, स्थानीयकरण के दबाव बढ़ रहे हैं, और भारत सरकार की ओर से कोई ठोस कूटनीतिक पहल नज़र नहीं आ रही। इन प्रवासी मजदूरों का पसीना भारत की विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा है — और अब वही रोज़ी-रोटी संकट में है।
पाकिस्तान से वार्ता: सीमा पर मनोबल बनाम अमेरिकी इशारा :- लंबे समय से भारत की स्थिति थी- ‘आतंक और बातचीत एक साथ नहीं।’ लेकिन 2025 की शुरुआत में, बाइडन या ट्रंप प्रशासन के दबाव के समय, भारत को पाकिस्तान से बातचीत के लिए कहा गया। इससे ठीक पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक प्रतिनिधिमंडल अमेरिका गया था, और उसके बाद संघ के मुखपत्रों में ‘पाकिस्तान से वार्ता’ के संकेत दिखे। जनता के लिए हकीकत यह है कि सीमा पर आतंकी घटनाओं में कोई कमी नहीं आई। नशा, फेक करेंसी, हथियारों की तस्करी जारी है। सीमा पर तैनात जवानों का मनोबल गिरता है जब उन्हें लगता है कि दबाव में आकर राजनीतिक झुकाव हो रहा है। आम आदमी को सुरक्षा के मामले में कोई राहत नहीं मिलती।
आत्मनिर्भर भारत का उल्टा चेहरा: चीन पर निर्भरता बढ़ी :- सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा देती है, लेकिन 2023 में चीन से आयात $130 बिलियन के पार पहुँच गया। भारत का चीन को निर्यात मुश्किल से $20 बिलियन है। मोबाइल, एपीआई दवाइयाँ, इलेक्ट्रॉनिक घटक, मशीनरी-लगभग हर क्षेत्र में चीन हावी है।यह अमेरिकी दबाव की विडंबना है। अमेरिका चीन पर टैरिफ लगाता है, तो चीनी माल भारत में डंप होता है। भारत चीन से व्यापार घटा नहीं सकता, क्योंकि अमेरिकी कंपनियाँ भी भारत से चीनी माल के विकल्प नहीं माँगतीं। परिणाम यह है कि देशी उद्योग-खिलौने, कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स-दब गए। छोटे कारोबारी बंद हो रहे हैं। ‘आत्मनिर्भरता’ चीनी सामान की फेरी लगाने वालों के लिए कामयाबी बन गई है, लेकिन निर्माताओं के लिए बर्बादी।
अडानी–एपस्टीन फाइलें: अमेरिकी जांच का साया :- 2023 में हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद अमेरिकी अदालतों में अडानी समूह के खिलाफ मामले दायर हुए। हाल ही में सामने आई ‘एपस्टीन फाइलों’ में कई वैश्विक हस्तियों के नाम हैं-हालाँकि किसी भारतीय नेता का कोई सीधा सबूत सार्वजनिक नहीं है। लेकिन असर यह हुआ कि अमेरिका ने अडानी समूह की कुछ विदेशी परियोजनाओं की जाँच तेज कर दी। भारत सरकार ने इस पर कोई मुखर प्रतिक्रिया नहीं दी-क्योंकि उसे अमेरिकी बाजार, बैंक और निवेशक चाहिए। जब बड़े उद्योगपति अमेरिकी दबाव में झुकते हैं, तो निजी निवेश रुक जाता है। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव से सामान्य निवेशकों की पूँजी डूबती है। रोजगार के नए अवसर नहीं खुलते।
किसान और गरीब: सब्सिडी कटौती का अमेरिकी एजेंडा :- अमेरिका और उसके सहयोगी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान (IMF, विश्व बैंक) लगातार भारत पर सब्सिडी कटौती, कृषि कानूनों में बदलाव और बाजार खोलने का दबाव डालते हैं। इसी दबाव के परिणामस्वरूप वे तीन कृषि कानून लाए गए — बाद में वापस लिए गए, लेकिन तब तक किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। उर्वरक सब्सिडी में कटौती, एमएसपी पर लगातार सवाल, और किसान क्रेडिट कार्ड में बदलाव — सब अमेरिकी सलाह के तहत।
इसका असर सीधा गाँवों में दिखा। खाद (यूरिया, DAP) के दाम बढ़े। फसलों के दाम गिरे, लागत बढ़ी। कर्ज और किसान आत्महत्याओं के आँकड़े बढ़े — आधिकारिक आँकड़े कम बताए गए, लेकिन स्थानीय रिपोर्टें भयावह हैं। शहरी जनता को महँगी सब्जी और महँगा अनाज खरीदना पड़ता है।
सरकार पर अनाप-शनाप खर्चे, जनता पर नसीहत :- जहाँ एक ओर जनता महँगाई, बेरोज़गारी और पलायन से जूझ रही है, वहीं सरकार अनाप-शनाप खर्चे कर रही है। जनता को यह नसीहत दी जा रही है कि खर्चा कम करो, कम खाओ, सोना न खरीदो। प्रधानमंत्री अपने मित्रों और सहयोगियों के साथ तालमेल बढ़ाने के बजाय इज़राइल, यूएई और अमेरिका के पर्यटन और गलियारों में व्यस्त दिख रहे हैं। खाड़ी के हितों की रक्षा करना तो दूर, भारतीय मजदूरों के अधिकारों के लिए कोई आवाज़ नहीं उठाई जा रही। विदेश नीति ‘रणनीतिक स्वतंत्रता’ की जगह ‘रणनीतिक चुप्पी’ बन गई है।
निष्कर्ष : तीन सवाल जो सरकार से पूछे जाने चाहिए
(प्रिय पाठक, यह लेख किसी राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं है। यह उन सवालों की सूची है जो हर उस नागरिक के मन में उठते हैं, जो रोज़ पेट्रोल भरता है, रोज़ सब्जी मोल लेता है, रोज़ सीमा पर हमलों की खबर सुनता है, या जिसका बेटा खाड़ी में रोज़ी-रोटी के लिए तरस रहा है। तथ्य यह है कि अमेरिकी दबाव में ली गई नीतियों से भारत को चारों तरफ नुकसान हो रहा है-ऊर्जा से लेकर कृषि तक, सुरक्षा से लेकर व्यापार तक। चीन, रूस, ईरान अमेरिकी ‘दादागिरी’ का मुँहतोड़ जवाब दे रहे हैं, लेकिन भारत ‘रणनीतिक स्वतंत्रता’ के खोखले नारों के पीछे चुप रहकर जनता की जेब कटने दे रहा है।)
यदि सरकार वाकई स्वतंत्र विदेश नीति का दावा करती है, तो उसे जवाब देना चाहिए:
- पेट्रोल इतना महँगा क्यों है, जबकि रूसी तेल सस्ता मिल रहा था?
- किसानों की सब्सिडी क्यों काटी जा रही है, जब अमेरिका अपने किसानों को ट्रिलियन डॉलर की सब्सिडी देता है?
- चीन पर निर्भरता क्यों बढ़ी, जब आत्मनिर्भरता का नारा दिया था?
(जमीनी हकीकत पर केन्द्रित विश्लेषक) लेखक अनन्त आकाश सीपीआई (एम) देहरादून के सचिव हैं।
