देहरादून की पहली डाक चौकी ऐतिहासिक परेड ग्राउंड के समीप स्थापित की गई

देहरादून। गढ़वाल क्षेत्र में संगठित डाक संचार का इतिहास ब्रिटिश काल की प्रशासनिक और सैन्य आवश्यकताओं के साथ कदमताल करते हुए आगे बढ़ा। जब 1820 के दशक में अंग्रेजों ने दून घाटी पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया, तो एक मजबूत संचार तंत्र की आवश्यकता महसूस हुई।  उस समय संचार का पूरा दारोमदार ‘हरकारों’ (संदेशवाहकों) पर था, जो हाथ में घंटी लगी लाठी लेकर मीलों पैदल दौड़कर संदेश पहुँचाते थे। इसके तहत देहरादून की पहली डाक चौकी ऐतिहासिक परेड ग्राउंड के समीप स्थापित की गई। यह क्षेत्र उस समय सैन्य और प्रशासनिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र था, इसलिए शुरुआती दौर में यहाँ आने वाली डाक केवल ब्रिटिश छावनी के अधिकारियों और सैनिकों तक ही सीमित थी। इस प्रारंभिक काल में संचार का पूरा दारोमदार हरकारों पर था, जो हाथ में घंटी लगी लाठी लेकर मीलों पैदल दौड़कर संदेश पहुँचाते थे। जैसे-जैसे घाटी का नागरिक विस्तार हुआ और व्यापारिक गतिविधियां बढ़ीं, डाक व्यवस्था को सैन्य परिसर से बाहर निकालने की जरूरत महसूस हुई। इसके बाद इस डाक केंद्र को शहर के सबसे व्यस्त और प्रमुख व्यावसायिक केंद्र, मोती बाजार के समीप स्थानांतरित किया गया। मोती बाजार की इस नई डाक चौकी ने आम जनता, स्थानीय व्यापारियों और नागरिक प्रशासन के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम किया और यह सीधे सहारनपुर और अंबाला के मुख्य डाक नेटवर्क से जुड़ गई। इसके कुछ समय बाद ही, 1830 के दशक की शुरुआत में पहाड़ों पर पहली प्रशासनिक दस्तक देते हुए मसूरी में क्षेत्र के पहले पर्वतीय डाकघर की नींव पड़ी, जहाँ मोती बाजार से राजपुर होते हुए डाक भेजी जाती थी। मार्ग में धावकों के विश्राम और डाक बदलने के लिए राजपुर जैसे स्थानों पर विशेष डाक बंगले भी बनाए गए। बीसवीं सदी की शुरुआत में मसूरी के दूसरे छोर पर संचार इतिहास का एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ा। वर्ष 1902 में मसूरी के लाइब्रेरी क्षेत्र में आलीशान होटल सेवाय बनकर तैयार हुआ। इस भव्य होटल में रुकने वाले ब्रिटिश मेहमानों, वायसराय और उच्च अधिकारियों की संचार सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए होटल परिसर के भीतर ही एक विशेष छोटे डाकघर की स्थापना की गई, जिसे सेवाय पोस्ट ऑफिस नाम दिया गया। इस डाकघर की ऐतिहासिकता आज भी कायम है; यहाँ होने वाले पत्राचार पर लगने वाली आधिकारिक मुहर पर आज भी शहर के नाम के बजाय सेवाय होटल अंकित होता है। ब्रिटिश काल में तय हुआ इसका 99  रुपये का मासिक किराया शायद आज तक जारी है, जिसे भारतीय डाक विभाग आज भी हर महीने होटल सेवाय को बकायदा अदा करता है। इतने आलीशान और महंगे परिसर में आज के दौर में भी इसी नाममात्र के किराए पर इसका निरंतर संचालन इसके जीवंत इतिहास को प्रमाणित करता है। इस प्रकार, देहरादून के परेड ग्राउंड से शुरू हुआ यह सफर मोती बाजार और मसूरी के मुख्य क्षेत्रों से होता हुआ सेवाय होटल तक पहुंचा, जिसने इस पूरे क्षेत्र को आधुनिक संचार व्यवस्था से जोड़े रखा।

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