August 19, 2026

संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 8 अगस्त 1942 का दिन एक ऐसे निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज है, जब देश की स्वतंत्रता की आकांक्षा ने एक व्यापक जनआंदोलन का रूप ले लिया। मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के ऐतिहासिक अधिवेशन के दौरान महात्मा गांधी ने अंग्रेजी हुकूमत को भारत छोड़ने का स्पष्ट संदेश दिया और देशवासियों से “करो या मरो” का आह्वान किया। इसी के साथ भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष को एक नई और निर्णायक दिशा प्रदान की।
क्रिप्स मिशन की विफलता से बढ़ा असंतोष
द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में ब्रिटिश सरकार भारत से युद्ध में सहयोग चाहती थी, लेकिन भारतीयों को तत्काल स्वतंत्रता देने के सवाल पर वह तैयार नहीं थी। 1942 में सर स्टैफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में भारत आया मिशन भी भारतीय राजनीतिक आकांक्षाओं को संतुष्ट नहीं कर सका। क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में असंतोष और अधिक गहरा गया।
महात्मा गांधी का मानना था कि अब अंग्रेजों के भारत पर शासन जारी रहने का कोई नैतिक या राजनीतिक औचित्य नहीं बचा है। कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन के तत्काल अंत की मांग को आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बनाया।
ग्वालिया टैंक मैदान से उठी निर्णायक आवाज
7 अगस्त 1942 से मुंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का ऐतिहासिक अधिवेशन शुरू हुआ और 8 अगस्त की रात भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया गया। ग्वालिया टैंक मैदान में गांधी जी ने अपने ऐतिहासिक संबोधन में देशवासियों को स्वतंत्रता के लिए अंतिम संघर्ष का संदेश दिया।
उनका संदेश था—“करो या मरो।” यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए भारतीय जनता के सामने रखा गया संकल्प था। गांधी जी ने संघर्ष का आधार अहिंसा को बनाए रखने पर भी जोर दिया।
9 अगस्त की सुबह अंग्रेजी सरकार का दमन
आंदोलन की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के विरुद्ध व्यापक कार्रवाई शुरू कर दी। 9 अगस्त की सुबह महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित अनेक प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। कांग्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया और देशभर में गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हो गया।
लेकिन अंग्रेजी सरकार की यही कार्रवाई आंदोलन को दबाने के बजाय उसे और व्यापक बनाने वाली साबित हुई। नेतृत्व की बड़ी संख्या जेल में होने के बावजूद आम जनता स्वयं आंदोलन की कमान संभालने लगी।
गांव-गांव पहुंचा स्वतंत्रता का संदेश
भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह केवल बड़े शहरों या राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहा। विद्यार्थी, किसान, मजदूर, महिलाएं और सामान्य नागरिक बड़ी संख्या में इससे जुड़े। देश के अनेक हिस्सों में हड़तालें, प्रदर्शन और ब्रिटिश शासन के प्रतीकों के बहिष्कार के अभियान चले। भूमिगत नेताओं ने भी आंदोलन को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अरुणा आसफ अली ने मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराकर आंदोलन की भावना को नई ऊर्जा दी। उषा मेहता और उनके सहयोगियों ने भूमिगत कांग्रेस रेडियो के माध्यम से आंदोलनकारियों तक समाचार और संदेश पहुंचाए। जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और अनेक अन्य कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर संघर्ष को आगे बढ़ाया।
दमन के सामने नहीं झुका भारत
अंग्रेजी शासन ने आंदोलन को कुचलने के लिए गिरफ्तारियों, लाठीचार्ज, गोलीबारी और कठोर दमन का सहारा लिया। कई स्थानों पर आंदोलन हिंसक घटनाओं में भी बदल गया। रेलवे, डाक-तार और सरकारी संस्थानों को निशाना बनाया गया तथा कुछ क्षेत्रों में समानांतर प्रशासन स्थापित करने के प्रयास भी हुए।
इन घटनाओं के बावजूद भारत छोड़ो आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब भारतीय जनता ब्रिटिश शासन को अनिश्चित काल तक स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी।
ब्रिटिश साम्राज्य की नींव पर पड़ा निर्णायक प्रभाव
भारत छोड़ो आंदोलन तत्काल स्वतंत्रता प्राप्त करने में सफल नहीं हुआ। आंदोलन को अंग्रेजी सरकार ने कठोरता से दबा दिया और इसके अनेक नेता लंबे समय तक जेल में रहे। फिर भी इसका ऐतिहासिक महत्व अत्यंत गहरा था। इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन को यह अहसास करा दिया कि भारत पर लंबे समय तक राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखना कठिन होता जा रहा है। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग के अनुसार, आंदोलन के बाद ब्रिटिश शासन और कांग्रेस के बीच टकराव अत्यंत तीखा हुआ तथा व्यापक दमन के बावजूद स्वतंत्रता की मांग को दबाया नहीं जा सका।
भारत सरकार के अनुसार भी भारत छोड़ो आंदोलन ने अंग्रेजों को यह समझने पर मजबूर किया कि भारत पर शासन जारी रखना संभव नहीं होगा और उनके लिए भारत से निकलने के रास्ते तलाशना आवश्यक हो गया था।
स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई का अमर अध्याय
भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह अध्याय था, जिसमें देश की जनता ने अंग्रेजी शासन के सामने अंतिम और निर्णायक चुनौती प्रस्तुत की। 8 अगस्त 1942 को ग्वालिया टैंक मैदान से उठी “करो या मरो” की हुंकार अगले दिन नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद पूरे देश में फैल गई।
इस आंदोलन ने यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता केवल कुछ नेताओं की मांग नहीं रह गई थी, बल्कि वह करोड़ों भारतीयों की सामूहिक आकांक्षा बन चुकी थी। इसके पांच वर्ष बाद, 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।
भारत छोड़ो आंदोलन इसलिए केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था—यह उस राष्ट्रीय चेतना का विस्फोट था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को यह संदेश दे दिया कि अब भारत को गुलाम बनाए रखना इतिहास के विरुद्ध जाना है।
“करो या मरो” की वह हुंकार आज भी स्वतंत्रता के लिए किए गए त्याग, संघर्ष और अदम्य संकल्प की अमर गूंज है।

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