August 19, 2026

संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल बड़े नेताओं और प्रसिद्ध आंदोलनों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन असंख्य साहसी स्त्री-पुरुषों के संघर्ष की गाथा भी है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की कठोर दमन-नीति के सामने झुकने से इनकार कर दिया। ऐसी ही निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी थीं अरुणा आसफ़ अली, जिन्हें 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की प्रमुख महिला प्रतीकों में गिना जाता है। अरुणा आसफ़ अली भारत के स्वतंत्रता संग्राम की एक महान और साहसी महिला थीं। उन्हें 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का झंडा फहराने के लिए जाना जाता है। ब्रिटिश सरकार ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। इसके बावजूद वे भूमिगत रहकर आंदोलन का नेतृत्व करती रहीं। अरुणा आसफ़ अली का जन्म 16 जुलाई 1909 को कालका, हरियाणा में हुआ था। उनका मूल नाम अरुणा गांगुली था। उनका विवाह स्वतंत्रता सेनाभी आसफ़ अली से हुआ था। 1942 में उन्होंने भूमिगत (छिपे हुए) रहकर आंदोलन चलाया। उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों और पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। स्वतंत्रता के बाद वे दिल्ली की पहली महापौर चुनी गईं। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा के लिए भी बहुत काम किया। उन्हें 1964 में लेनिन शांति पुरस्कार और 1997 में मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 29 जुलाई 1996 को उनका निधन हुआ।
8 अगस्त 1942 को बंबई (अब मुंबई) के ग्वालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया। महात्मा गांधी ने देशवासियों से अंग्रेजी शासन के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष का आह्वान करते हुए ‘करो या मरो’ का संदेश दिया। अगले ही दिन ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस के अनेक प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। नेतृत्व की इस अचानक गिरफ्तारी के बाद आंदोलन को जारी रखना बड़ी चुनौती थी।
ऐसे समय में 9 अगस्त 1942 को अरुणा आसफ़ अली ने ग्वालिया टैंक मैदान में कांग्रेस का झंडा फहराकर आंदोलन की लौ को प्रज्वलित रखने का साहसिक कार्य किया। यह घटना भारत छोड़ो आंदोलन के इतिहास में उनके नाम को अमर कर गई। ब्रिटिश प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और गिरफ्तारियों के बावजूद उनका मैदान में पहुंचना और तिरंगा फहराना जनता के लिए प्रतिरोध और संकल्प का शक्तिशाली प्रतीक बन गया।
इसके बाद अरुणा आसफ़ अली भूमिगत होकर स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुट गईं। ब्रिटिश पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने के लिए लगातार प्रयास करती रही और उनकी गिरफ्तारी पर इनाम की घोषणा भी की गई। इसके बावजूद वह लंबे समय तक भूमिगत रहकर आंदोलन से जुड़े कार्यों में सक्रिय रहीं। उन्होंने भूमिगत साहित्य और संचार माध्यमों के जरिए ब्रिटिश सरकार के दुष्प्रचार का मुकाबला करने में भी भूमिका निभाई।
भूमिगत आंदोलन और कांग्रेस रेडियो
1942 के आंदोलन के दौरान भूमिगत गतिविधियों ने स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी। उषा मेहता और उनके साथियों द्वारा संचालित गुप्त कांग्रेस रेडियो ने ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक प्रचार के समानांतर आंदोलनकारियों की आवाज जनता तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण काम किया। इस गुप्त प्रसारण ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनमत को मजबूत करने में भूमिका निभाई।
अरुणा आसफ़ अली का संघर्ष केवल सड़कों और सभाओं तक सीमित नहीं था। वह भूमिगत रहकर भी राजनीतिक गतिविधियों और स्वतंत्रता आंदोलन के संदेश को आगे बढ़ाती रहीं। उनकी संपत्ति तक ब्रिटिश प्रशासन द्वारा जब्त किए जाने की कार्रवाई की गई, लेकिन उनके हौसले को नहीं तोड़ा जा सका।
गांधीजी से मतभेद, लेकिन सम्मान कायम
अरुणा आसफ़ अली के भूमिगत रहने को लेकर महात्मा गांधी की अपनी चिंताएं थीं। गांधीजी चाहते थे कि वह अपने स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा को देखते हुए आत्मसमर्पण पर विचार करें। अरुणा ने गांधीजी के इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वह ब्रिटिश शासन के सामने आत्मसमर्पण को अपने संघर्ष के मूल उद्देश्य के विपरीत मानती थीं।
यह प्रसंग स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर मौजूद विभिन्न रणनीतिक विचारों को भी सामने लाता है। उल्लेखनीय बात यह रही कि रणनीति को लेकर मतभेद के बावजूद गांधीजी के मन में अरुणा के साहस और देशभक्ति के प्रति गहरा सम्मान बना रहा।
जवाहरलाल नेहरू ने भी उनके साहस की प्रशंसा की थी। इस प्रकार अरुणा आसफ़ अली उस दौर में उन स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिनिधि बन गईं, जिन्होंने नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन को ठहरने नहीं दिया।
बचपन से स्वतंत्रता आंदोलन तक
अरुणा आसफ़ अली का जन्म 16 जुलाई 1909 को कालका में हुआ था। उनका मूल नाम अरुणा गांगुली था। उनका परिवार बंगाली ब्राह्मण पृष्ठभूमि से संबंधित था। उन्होंने नैनीताल के ऑल सेंट्स कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर अध्यापन कार्य भी किया।
उनका जीवन उस समय एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश का भी प्रतीक बना, जब उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस नेता आसफ़ अली से विवाह किया। दोनों की धार्मिक और उम्र संबंधी भिन्नताओं के बावजूद उनका संबंध उस दौर के सामाजिक रूढ़ियों के बीच एक साहसिक निर्णय था। विवाह के बाद अरुणा गांगुली, अरुणा आसफ़ अली के नाम से जानी गईं।
आसफ़ अली स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे और कई बार जेल जा चुके थे। उनके संपर्क और राजनीतिक वातावरण ने अरुणा के भीतर भी राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति सक्रिय प्रतिबद्धता को मजबूत किया।
जेल में भी संघर्ष जारी रखा
स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण अरुणा आसफ़ अली को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार किया। नमक सत्याग्रह और अन्य राजनीतिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी ने उन्हें औपनिवेशिक प्रशासन की निगाह में ला दिया।
1932 में उन्होंने तिहाड़ जेल में राजनीतिक कैदियों के साथ किए जा रहे व्यवहार के विरोध में भूख हड़ताल की। उनका संघर्ष केवल अपनी स्वतंत्रता के लिए नहीं था, बल्कि जेलों में बंद राजनीतिक कैदियों के सम्मान और अधिकारों के लिए भी था। उनके विरोध के परिणामस्वरूप कैदियों की परिस्थितियों में कुछ सुधार हुआ, हालांकि उन्हें स्वयं कठोर कारावास और एकांतवास का सामना करना पड़ा।
इस संघर्ष ने उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को सामने रखा जिसमें राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ मानवीय गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी।
स्वतंत्रता के बाद भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय
देश स्वतंत्र हुआ तो अरुणा आसफ़ अली ने सार्वजनिक जीवन से स्वयं को पूरी तरह अलग नहीं किया। उन्होंने पत्रकारिता और सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में योगदान दिया। उन्होंने ‘पैट्रियट’ दैनिक और ‘लिंक’ साप्ताहिक जैसे प्रकाशनों से भी जुड़कर सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित किया।
वह समाजवादी विचारधारा से भी प्रभावित रहीं और बाद के वर्षों में वामपंथी राजनीति से जुड़ीं। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने कांग्रेस में भी पुनः प्रवेश किया और दिल्ली की पहली महिला मेयर के रूप में महत्वपूर्ण दायित्व संभाला। इस प्रकार उनका सार्वजनिक जीवन स्वतंत्रता आंदोलन से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक भारत के निर्माण की प्रक्रिया से भी जुड़ा रहा।
सम्मान और विरासत
अरुणा आसफ़ अली को उनके दीर्घ सार्वजनिक जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार और जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार सहित विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया।
29 जुलाई 1996 को उनका निधन हुआ। उनके निधन के बाद भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।
अरुणा आसफ़ अली का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उस अदम्य चेतना का प्रतीक है, जिसमें भय के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना गया। 9 अगस्त 1942 को ग्वालिया टैंक मैदान में कांग्रेस का झंडा फहराने वाली वह साहसी महिला आगे चलकर भूमिगत आंदोलन की एक महत्वपूर्ण आवाज बनीं।
उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता के हस्तांतरण का नाम नहीं थी। उसके पीछे अनगिनत लोगों का साहस, त्याग, कारावास, संघर्ष और आत्मसम्मान जुड़ा था। अरुणा आसफ़ अली इसी अमर संघर्ष की ऐसी वीरांगना थीं, जिनका नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सदैव सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा।

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