7 नवंबर 1966 को दिल्ली में हुआ था साधु-संतों का संसद भवन घेराव

संदीप गोयल/एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस

देहरादून। 7 नवंबर 1966 को दिल्ली में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर गोपाष्टमी के दिन स्वामी करपात्री महाराज के नेतृत्व में हजारों साधु-संतों और प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन का घेराव किया था। इस दौरान पुलिस की फायरिंग में कई प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी। इस घटना को लेकर तत्कालीन सरकार की भारी आलोचना हुई थी और यह देश के इतिहास में एक प्रमुख गो रक्षा आंदोलन के रूप में जाना जाता है।

हिंदू संगठन और साधु-संत देश में गौ हत्या पर पूरी तरह से रोक लगाने के लिए कानून बनाने की मांग कर रहे थे। उस दिन करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में सवा लाख से अधिक लोग संसद के सामने जमा हुए थे। स्थिति अनियंत्रित होने पर पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए गोलीबारी की, जिसमें कई प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। इस घटना में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे, जिससे कांग्रेस सरकार को हिंदुओं के गुस्से का सामना करना पड़ा। इस आंदोलन के बाद तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने इस्तीफा दे दिया था।

पहला संगठित गौ संरक्षण आंदोलन सिख धर्म के कूका समुदाय द्वारा ब्रिटिश राज के दौरान 1800 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू किया गया था, जो एक सुधारवादी समूह था। इस आंदोलन में गायों को “राज्य की नैतिक गुणवत्ता का प्रतीक” बताया गया था। उनके विचार जल्द ही हिंदू सुधार आंदोलनों में फैल गए, जिसमें आर्य समाज ने इस भावना को एक राष्ट्रीय आंदोलन में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और गौहत्या को अपराध घोषित करने के लिए व्यापक रूप से पैरवी की। पहली गौक्षिणी सभा (गौ संरक्षण परिषद) की स्थापना 1882 में पंजाब प्रांत में हुई थी।

संविधान के अनुच्छेद 48 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) में गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू पशुओं के वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया गया है। वर्तमान स्थिति: गौ हत्या राज्य का विषय है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, और मध्य प्रदेश सहित लगभग 20 राज्यों में मवेशियों के वध को प्रतिबंधित करने वाले कानून पहले से ही लागू हैं।

विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों, जैसे ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, द्वारा गाय को ‘राष्ट्र माता’ या ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने और संपूर्ण राष्ट्र में इसके वध पर प्रतिबंध लगाने के लिए केंद्रीय कानून की मांग की जाती रही है।

 

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