और जब नीलांबर दत्त पंत को विद्यालय में तिरंगा ध्वज ले जाने के कारण दिया गया दंड

संदीप गोयल/एस.के.एम. न्यूज सर्विस

देहरादून, 28 जुलाई। अवधेश पंत गांधीवादी विचारधारा के समर्पित कर्मयोगी एवं स्वतंत्रता सेनानी परिवारों के सम्मान के सजग प्रहरी हैं। अवधेश पंत उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के एक प्रतिष्ठित गांधीवादी एवं स्वतंत्रता सेनानी परिवार से संबंध रखते हैं। वे महान स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय नीलांबर दत्त पंत के सुपुत्र हैं। उनके व्यक्तित्व, विचारों एवं सार्वजनिक जीवन पर अपने पिता के राष्ट्रप्रेम, त्याग, सादगी और गांधीवादी जीवन-दर्शन की अमिट छाप है। स्वर्गीय नीलांबर दत्त पंत ने मात्र 13 वर्ष की आयु में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी प्रारम्भ कर दी थी। विद्यालय में प्रतिबंधित साहित्य तथा तिरंगा ध्वज ले जाने के कारण उन्हें दो बार दस-दस बेंतों का दंड दिया गया तथा विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण वे दो-दो माह की अवधि के लिए कारावास भी गए। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी उन्होंने जनसेवा को अपने जीवन का ध्येय बनाए रखा। वे देहरादून की प्रथम नगर पालिका परिषद के निर्वाचित सदस्य रहे तथा उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में जिला पंचायत सदस्य के रूप में नामित किए गए। महात्मा गांधी के सिद्धांतों से प्रेरित स्वर्गीय नीलांबर दत्त पंत ने जीवनपर्यंत खादी धारण की तथा स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सरकार द्वारा प्रदत्त सुविधाओं का स्वेच्छा से त्याग किया। उनके लिए राष्ट्रसेवा किसी भी व्यक्तिगत लाभ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।

इन्हीं उच्च आदर्शों और संस्कारों को आत्मसात करते हुए अवधेश पंत पिछले लगभग 48 वर्षों से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की विचारधारा के प्रति पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ जनसेवा एवं संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय हैं। उन्होंने छात्र राजनीति से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की तथा छात्र संगठन, युवा कांग्रेस और कांग्रेस संगठन के विभिन्न दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। उनका संपूर्ण राजनीतिक जीवन सेवा, संगठन, सामाजिक न्याय और राष्ट्रहित के मूल्यों पर आधारित रहा है।

उनके सार्वजनिक जीवन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा आयोजित कश्मीर से कन्याकुमारी पदयात्रा में उत्तराखंड से एकमात्र संदेश यात्री के रूप में सहभागिता है। यह उनके राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन का एक गौरवपूर्ण अध्याय है।

स्वतंत्रता सेनानियों एवं शहीद परिवारों के सम्मान, अधिकारों और कल्याण के लिए कार्य करना अवधेश पंत के जीवन का सर्वोच्च ध्येय है। वे अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं शहीद परिवार कल्याण महापरिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में देशभर में स्वतंत्रता सेनानी परिवारों के अधिकारों एवं सम्मान की रक्षा के लिए निरंतर कार्यरत हैं। उन्होंने देश के लगभग 17 राज्यों का व्यापक प्रवास कर स्वतंत्रता सेनानी परिवारों से जुड़े करोड़ों लोगों के बीच उनके पूर्वजों के त्याग, बलिदान और राष्ट्रीय योगदान के प्रति जागरूकता का अभियान चलाया है।

महात्मा गांधी के स्वदेशी, स्वावलंबन और ग्रामोदय के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने “हर घर चरखा” अभियान का संकल्प लिया है। उनका विश्वास है कि चरखा केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, श्रम की गरिमा, स्वदेशी चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है। वे गांधीजी के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।

अपने पिता की त्यागमयी परंपरा का अनुसरण करते हुए अवधेश पंत ने भी स्वतंत्रता सेनानी परिवार को प्राप्त होने वाली सरकारी सुविधाओं तथा उत्तराखंड सरकार द्वारा प्रदत्त पेंशन को स्वीकार नहीं किया। यह निर्णय उनके सिद्धांतनिष्ठ जीवन, आत्मसम्मान और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण का प्रतीक है।

वर्तमान में वे उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस स्वतंत्रता सेनानी/उत्तराधिकारी प्रकोष्ठ में प्रदेश महामंत्री के रूप में उत्तराखंड के लगभग 22,000 स्वतंत्रता सेनानी परिवारों के सम्मान, अधिकारों एवं कल्याण के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। उनका उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना, शहीदों एवं स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान की रक्षा करना तथा गांधीवादी मूल्यों पर आधारित समाज के निर्माण में सार्थक योगदान देना है।

अवधेश पंत का जीवन राष्ट्रनिष्ठा, सामाजिक समर्पण, संगठनात्मक प्रतिबद्धता और गांधीवादी आदर्शों का प्रेरणास्पद उदाहरण है। उनका दृढ़ विश्वास है कि स्वतंत्रता केवल इतिहास का गौरव नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए राष्ट्रीय चेतना, कर्तव्यबोध और प्रेरणा का शाश्वत स्रोत है। स्वतंत्रता सेनानियों की अमर विरासत का संरक्षण और उनके परिवारों के सम्मान की रक्षा ही उनके सार्वजनिक जीवन का मूल संकल्प है।

 

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