भारत का स्वतंत्रता आंदोलन : त्याग, संघर्ष और बलिदान की अमर गाथा
संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन विश्व इतिहास के सबसे बड़े और प्रेरणादायक जनआंदोलनों में से एक माना जाता है। लगभग दो शताब्दियों तक ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चले इस संघर्ष में लाखों भारतीयों ने अपने प्राणों की आहुति दी। यह केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का आंदोलन नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान, सामाजिक जागरण और राष्ट्रीय एकता का भी अभियान था।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने धीरे-धीरे भारत के विशाल भूभाग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों, आर्थिक शोषण और सामाजिक अन्याय के कारण देशभर में असंतोष बढ़ता गया। इस असंतोष का पहला बड़ा विस्फोट 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में हुआ। मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहेब और बेगम हजरत महल जैसे वीरों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया। यद्यपि यह विद्रोह सफल नहीं हो सका, लेकिन इसने स्वतंत्रता की लौ पूरे देश में जला दी।
सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित दिशा मिली। प्रारंभिक वर्षों में संवैधानिक सुधारों की मांग की गई, लेकिन अंग्रेजी सरकार की हठधर्मिता के कारण आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक जनसंघर्ष में बदल गया।
बीसवीं शताब्दी में महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन ने नया स्वरूप ग्रहण किया। सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों पर आधारित असहयोग आंदोलन (1920), नमक सत्याग्रह एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) तथा भारत छोड़ो आंदोलन (1942) ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी। इन आंदोलनों में करोड़ों भारतीयों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
दूसरी ओर शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खाँ जैसे क्रांतिकारियों ने अपने अदम्य साहस और बलिदान से युवाओं में देशभक्ति की नई चेतना जगाई। वहीं नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन कर सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास किया।
स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ़ अली, कस्तूरबा गांधी, विजयलक्ष्मी पंडित और उषा मेहता सहित अनेक महिलाओं ने आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और समाज को नई दिशा दी।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, भारत में बढ़ते जनदबाव और स्वतंत्रता आंदोलन की तीव्रता के कारण ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा। अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले से स्वतंत्र भारत का प्रथम संदेश दिया।
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रीय एकता, त्याग, सत्य, अहिंसा और लोकतांत्रिक मूल्यों के बल पर बड़े से बड़ा लक्ष्य भी प्राप्त किया जा सकता है। आज़ादी असंख्य ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का परिणाम है, जिनके प्रति प्रत्येक भारतीय सदैव ऋणी रहेगा।
