भारत का स्वतंत्रता आंदोलन
संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन विश्व इतिहास के सबसे व्यापक, दीर्घकालीन और प्रेरणादायक जनआंदोलनों में से एक है। लगभग दो सौ वर्षों तक चले इस संघर्ष ने केवल भारत को विदेशी शासन से मुक्ति ही नहीं दिलाई, बल्कि लोकतंत्र, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान की भावना को भी नई पहचान दी। यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति, एक संगठन या एक वर्ग तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिलाएँ, व्यापारी, साहित्यकार, पत्रकार, संत, सैनिक और देश के हर वर्ग के लोगों ने भाग लिया। लाखों ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देकर भारत को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का मार्ग प्रशस्त किया।
अंग्रेजी शासन की स्थापना और शोषण
सत्रहवीं शताब्दी में व्यापार के उद्देश्य से भारत आई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने धीरे-धीरे भारतीय राज्यों की आंतरिक कमजोरियों का लाभ उठाकर अपना राजनीतिक व सैन्य प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया। 1757 के प्लासी के युद्ध तथा 1764 के बक्सर के युद्ध के बाद कंपनी की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई। इसके बाद अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों पर कब्जा करना, अत्यधिक कर लगाना और देश के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन प्रारंभ कर दिया।
भारतीय कुटीर उद्योगों को नष्ट कर ब्रिटेन में बने उत्पादों की बिक्री को बढ़ावा दिया गया। किसानों से भारी लगान वसूला गया, जिसके कारण अनेक क्षेत्रों में अकाल और गरीबी फैल गई। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण ने भारतीय जनता में अंग्रेजी शासन के प्रति गहरा असंतोष उत्पन्न कर दिया।
1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का पहला व्यापक विस्फोट 1857 में हुआ। इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। सैनिकों के असंतोष से प्रारंभ हुआ यह विद्रोह शीघ्र ही जनआंदोलन में बदल गया।
मेरठ से शुरू हुई क्रांति दिल्ली, कानपुर, झांसी, लखनऊ, बरेली, ग्वालियर और देश के अनेक भागों में फैल गई। बहादुर शाह ज़फ़र को प्रतीकात्मक रूप से भारत का सम्राट घोषित किया गया। रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की रक्षा के लिए अद्भुत वीरता का परिचय दिया। तात्या टोपे, नाना साहेब, मंगल पांडे, बेगम हजरत महल, कुंवर सिंह और अनेक वीरों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया।
यद्यपि यह क्रांति सफल नहीं हो सकी, लेकिन इसने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया और भविष्य के स्वतंत्रता आंदोलन की मजबूत नींव रखी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। प्रारंभिक वर्षों में कांग्रेस के नेताओं ने संवैधानिक सुधारों और भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी की मांग की। दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे नेताओं ने राजनीतिक जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बंग-भंग और स्वदेशी आंदोलन
1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल का विभाजन किया गया। इसका पूरे देश में तीव्र विरोध हुआ। स्वदेशी आंदोलन प्रारंभ हुआ, जिसमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का व्यापक अभियान चलाया गया।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल और लाला लाजपत राय ने इस आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की। “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” का उद्घोष पूरे देश में गूंज उठा।
महात्मा गांधी का आगमन
1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद महात्मा गांधी ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी। उन्होंने सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया।
चंपारण सत्याग्रह, खेड़ा सत्याग्रह और अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन की सफलता ने गांधीजी को राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया।
असहयोग आंदोलन
1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया। इसके विरोध में महात्मा गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। लोगों ने सरकारी विद्यालयों, अदालतों, विदेशी वस्त्रों और सरकारी उपाधियों का बहिष्कार किया।
हालाँकि 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन स्थगित कर दिया, लेकिन इस आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम को जन-आंदोलन बना दिया।
क्रांतिकारी आंदोलन
जहाँ एक ओर गांधीजी अहिंसा के मार्ग पर चल रहे थे, वहीं दूसरी ओर अनेक क्रांतिकारी सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से देश को स्वतंत्र कराना चाहते थे।
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, बटुकेश्वर दत्त, खुदीराम बोस और अन्य अनेक क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।
1929 में दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में बम फेंककर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने “इंकलाब ज़िंदाबाद” का नारा बुलंद किया। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई, जिसने पूरे देश में स्वतंत्रता की भावना को और प्रबल कर दिया।
नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन
1930 में गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक लगभग 390 किलोमीटर की ऐतिहासिक यात्रा कर नमक कानून तोड़ा। यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया और लाखों लोगों ने इसमें भाग लिया। इस आंदोलन ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनसमर्थन को अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचा दिया।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” का आह्वान किया। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन कर अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ा। यद्यपि सैन्य दृष्टि से यह अभियान सफल नहीं हुआ, लेकिन इसने भारतीय सैनिकों और जनता में स्वतंत्रता की नई चेतना जगाई।
भारत छोड़ो आंदोलन
8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी ने “करो या मरो” का ऐतिहासिक संदेश दिया। इसके साथ ही भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ हुआ।
अंग्रेजों ने गांधीजी सहित अधिकांश नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन पूरे देश में जनता स्वतः सड़कों पर उतर आई। विद्यार्थियों, किसानों, महिलाओं और युवाओं ने आंदोलन को आगे बढ़ाया। इस आंदोलन ने अंग्रेजों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि अब भारत पर शासन करना संभव नहीं है।
महिलाओं का योगदान
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं ने भी अद्वितीय योगदान दिया। सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, अरुणा आसफ़ अली, उषा मेहता, विजयलक्ष्मी पंडित, दुर्गा भाभी, रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल और कैप्टन लक्ष्मी सहगल जैसी अनेक वीरांगनाओं ने स्वतंत्रता संग्राम को नई शक्ति प्रदान की।
पत्रकारों, साहित्यकारों और समाज सुधारकों की भूमिका
भारतीय पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाल गंगाधर तिलक के ‘केसरी’, महात्मा गांधी के ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किया।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जैसे साहित्यकारों की रचनाओं ने देशभक्ति की भावना को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
स्वतंत्रता की प्राप्ति
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद परिस्थितियाँ तेजी से बदलीं। भारत में बढ़ते जनदबाव, आज़ाद हिंद फ़ौज के प्रभाव, नौसेना विद्रोह तथा निरंतर जनसंघर्ष के कारण ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा।
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली के लाल किले से स्वतंत्र भारत के निर्माण का संकल्प व्यक्त किया। हालांकि देश का विभाजन अत्यंत पीड़ादायक रहा, जिसमें लाखों लोगों को विस्थापन और हिंसा का सामना करना पड़ा।
स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि लोकतंत्र, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और मानवाधिकारों की प्रेरणादायक विरासत है। यह आंदोलन हमें सिखाता है कि सत्य, अहिंसा, साहस, संगठन, त्याग और राष्ट्रीय एकता के बल पर असंभव प्रतीत होने वाले लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं।
आज जब भारत विश्व की प्रमुख शक्तियों में अपना स्थान बना रहा है, तब हमें उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को सदैव स्मरण रखना चाहिए, जिन्होंने अपना सर्वस्व राष्ट्र के नाम समर्पित कर दिया। उनका त्याग, समर्पण और राष्ट्रप्रेम आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
