भारत का स्वतंत्रता आंदोलन : त्याग, संघर्ष, बलिदान और राष्ट्रीय पुनर्जागरण की अमर गाथा
संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन केवल विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का इतिहास भी है। लगभग दो शताब्दियों तक चले इस महायज्ञ में लाखों ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। किसानों ने खेत छोड़े, विद्यार्थियों ने विद्यालय छोड़े, वकीलों ने अपनी सफल वकालत का त्याग किया, महिलाओं ने घरों से निकलकर आंदोलन का नेतृत्व किया और असंख्य युवाओं ने हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लिया।
15 अगस्त 1947 को प्राप्त हुई स्वतंत्रता किसी एक दिन की उपलब्धि नहीं थी। इसके पीछे सैकड़ों वर्षों का संघर्ष, त्याग, संगठन, जनजागरण और अनगिनत बलिदान छिपे थे। भारत का स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास का ऐसा अद्वितीय आंदोलन था जिसमें अहिंसक सत्याग्रह और सशस्त्र क्रांति—दोनों धाराएँ समानांतर रूप से चलती रहीं। एक ओर महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा के मार्ग पर करोड़ों लोगों को संगठित कर रहे थे, तो दूसरी ओर भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने को तत्पर थे।
भारत की समृद्धि और विदेशी व्यापारियों का आकर्षण
प्राचीन काल से भारत अपनी समृद्धि, कृषि, हस्तशिल्प, मसालों, वस्त्र उद्योग, धातुकला और व्यापार के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध था। यूरोपीय देशों के व्यापारी भारत के साथ व्यापार करना चाहते थे। पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज क्रमशः भारत पहुँचे। इन सभी का प्रारम्भिक उद्देश्य व्यापार था, किन्तु धीरे-धीरे अंग्रेजों ने व्यापार को राजनीतिक सत्ता में बदल दिया।
31 दिसंबर 1600 को इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया। इसके बाद कंपनी ने सूरत, मद्रास, बंबई और कलकत्ता सहित अनेक स्थानों पर व्यापारिक केंद्र स्थापित किए। समय के साथ कंपनी ने भारतीय राजाओं के बीच मतभेदों का लाभ उठाना प्रारम्भ कर दिया।
प्लासी और बक्सर : सत्ता परिवर्तन की शुरुआत
1757 का प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास की निर्णायक घटनाओं में से एक था। बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और रॉबर्ट क्लाइव के बीच हुए इस युद्ध में विश्वासघात के कारण नवाब की पराजय हुई। इस विजय ने अंग्रेजों को बंगाल की अपार संपदा और राजनीतिक प्रभाव प्रदान किया।
इसके बाद 1764 में बक्सर का युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेजों ने बंगाल, अवध और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना को पराजित किया। इस विजय के बाद कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई। यही वह मोड़ था, जहाँ से अंग्रेज व्यापारियों से शासक बन बैठे।
अंग्रेजी शासन और आर्थिक शोषण
अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों ने भारत की समृद्ध अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुँचाया। भारतीय कुटीर उद्योगों को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया गया। बंगाल का प्रसिद्ध वस्त्र उद्योग लगभग समाप्त हो गया। भारत से कच्चा माल सस्ते दामों पर इंग्लैंड भेजा जाता और वहाँ निर्मित वस्तुएँ भारतीय बाजारों में ऊँचे दामों पर बेची जाती थीं।
किसानों पर अत्यधिक लगान लगाया गया। स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी जैसी भू-राजस्व व्यवस्थाओं ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संकट में डाल दिया। अनेक क्षेत्रों में अकाल पड़े और लाखों लोगों को भुखमरी का सामना करना पड़ा। इस आर्थिक शोषण ने भारतीय समाज में अंग्रेजी शासन के प्रति व्यापक असंतोष पैदा किया।
सामाजिक और प्रशासनिक परिवर्तन
अंग्रेजों ने आधुनिक शिक्षा, डाक व्यवस्था, रेल, तार और न्यायालय जैसी व्यवस्थाएँ विकसित कीं। इनसे प्रशासनिक सुविधा तो बढ़ी, परंतु इनका उद्देश्य मुख्यतः अपने शासन को मजबूत करना था। फिर भी आधुनिक शिक्षा के प्रसार से भारतीय समाज में नई राजनीतिक चेतना विकसित हुई। शिक्षित भारतीयों ने स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र के विचारों को अपनाया और अंग्रेजी शासन की वास्तविकता को समझना शुरू किया।
राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और अन्य समाज सुधारकों ने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध अभियान चलाकर भारतीय समाज में आत्मविश्वास और नवजागरण की भावना पैदा की। यही नवजागरण आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन की वैचारिक शक्ति बना।
लॉर्ड डलहौजी और विलय की नीति
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने “लैप्स की नीति” (Doctrine of Lapse) लागू की। इसके अंतर्गत जिन रियासतों का कोई जैविक उत्तराधिकारी नहीं होता था, उन्हें अंग्रेज अपने अधिकार में ले लेते थे। सतारा, नागपुर, झाँसी और कई अन्य रियासतें इसी नीति के तहत ब्रिटिश शासन में मिला दी गईं।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने इस नीति का विरोध करते हुए कहा—”मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।” यह वाक्य आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक उद्घोष बन गया।
असंतोष के बढ़ते कारण
1857 से पहले भारतीय समाज में अंग्रेजों के प्रति असंतोष के अनेक कारण एक साथ उभर रहे थे—
किसानों पर अत्यधिक करों का बोझ।
भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव।
देसी राज्यों का विलय।
धार्मिक और सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप की आशंका।
भारतीय उद्योगों का विनाश।
बेरोज़गारी और गरीबी में वृद्धि।
भारतीयों को उच्च प्रशासनिक पदों से दूर रखना।
इन सभी कारणों ने मिलकर एक ऐसे वातावरण का निर्माण किया, जिसमें पूरे देश में विद्रोह की भावना तेजी से फैलने लगी।
क्रांति की आहट
1857 के प्रारंभ तक स्थिति अत्यंत विस्फोटक हो चुकी थी। सेना के भारतीय सिपाहियों में असंतोष चरम पर था। नई एनफील्ड राइफल के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी होने की चर्चा ने सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को गहरा आघात पहुँचाया। यह घटना पहले से मौजूद असंतोष के लिए चिंगारी सिद्ध हुई।
भारतीय जनता, किसान, सैनिक, जमींदार और अनेक राजघराने अंग्रेजी शासन से असंतुष्ट थे। अब वह समय निकट था, जब यह असंतोष एक विशाल जनविद्रोह का रूप लेने वाला था। 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास में राष्ट्रीय संघर्ष के एक नए युग का सूत्रपात करने वाला था।
