भारत का स्वतंत्रता आंदोलन : लाखों ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व राष्ट्र को समर्पित कर दिया
संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन विश्व इतिहास के सबसे व्यापक, दीर्घकालीन और प्रेरणादायक जनआंदोलनों में से एक है। लगभग दो शताब्दियों तक चले इस संघर्ष ने केवल भारत को विदेशी शासन से मुक्ति नहीं दिलाई, बल्कि राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र, सामाजिक जागरण, आत्मसम्मान और स्वाभिमान की ऐसी चेतना का संचार किया जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी। यह केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का आंदोलन नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक पुनर्जागरण भी था। इस महान संघर्ष में किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिलाएँ, संत, साहित्यकार, पत्रकार, व्यापारी, सैनिक और देश के कोने-कोने से जुड़े सामान्य नागरिक एकजुट होकर शामिल हुए। लाखों ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व राष्ट्र को समर्पित कर दिया।
15 अगस्त 1947 को प्राप्त हुई स्वतंत्रता किसी एक दिन या एक नेता के प्रयास का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे लगभग दो सौ वर्षों का सतत संघर्ष, असंख्य बलिदान, अनगिनत जेल यात्राएँ, जनआंदोलन, सत्याग्रह, क्रांतिकारी गतिविधियाँ और करोड़ों भारतीयों की अदम्य राष्ट्रीय भावना थी। भारत का स्वतंत्रता संग्राम इसलिए भी अद्वितीय है क्योंकि इसमें महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसा और सत्याग्रह की धारा तथा भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे वीरों के नेतृत्व में क्रांतिकारी धारा समानांतर रूप से चलती रही।
भारत की समृद्धि और अंग्रेजों का आगमन
प्राचीन काल से भारत अपनी समृद्ध सभ्यता, कृषि, हस्तशिल्प, मसालों, वस्त्र उद्योग और व्यापारिक संपन्नता के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध था। इसी समृद्धि ने यूरोपीय देशों को आकर्षित किया। पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज व्यापार के उद्देश्य से भारत आए, किंतु अंग्रेजों ने व्यापार को धीरे-धीरे राजनीतिक सत्ता में बदल दिया।
31 दिसंबर 1600 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई और उसे भारत में व्यापार का अधिकार प्राप्त हुआ। सूरत, मद्रास, बंबई और कलकत्ता में व्यापारिक केंद्र स्थापित करने के बाद कंपनी ने भारतीय रियासतों के आपसी मतभेदों का लाभ उठाना शुरू किया। व्यापारिक संस्था धीरे-धीरे सैन्य और राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो गई।
1757 का प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की पराजय और विश्वासघात के कारण अंग्रेजों को बंगाल पर प्रभाव स्थापित करने का अवसर मिला। इसके बाद 1764 के बक्सर के युद्ध में अंग्रेजों की विजय ने उन्हें बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्रदान कर दी। यहीं से भारत में अंग्रेजी सत्ता का वास्तविक विस्तार प्रारंभ हुआ।
आर्थिक शोषण और सामाजिक असंतोष
अंग्रेजों की औपनिवेशिक नीतियों का मुख्य उद्देश्य भारत की संपत्ति का दोहन था। भारत से कच्चा माल इंग्लैंड भेजा जाता और वहाँ निर्मित वस्तुएँ भारत में बेची जातीं। भारतीय कुटीर उद्योग धीरे-धीरे नष्ट होने लगे। बंगाल का प्रसिद्ध वस्त्र उद्योग, धातु उद्योग और अनेक पारंपरिक व्यवसाय संकट में आ गए।
किसानों पर भारी लगान लगाया गया। स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी जैसी भू-राजस्व व्यवस्थाओं ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया। अकाल, गरीबी और बेरोज़गारी बढ़ती गई। भारतीयों को उच्च प्रशासनिक पदों से दूर रखा गया और नस्लीय भेदभाव सामान्य बात बन गई। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर राष्ट्रीय असंतोष का आधार बनीं।
सामाजिक और वैचारिक जागरण
उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय समाज में सुधार आंदोलनों का आरंभ हुआ। राजा राममोहन राय ने सामाजिक सुधार और आधुनिक शिक्षा का समर्थन किया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने महिला शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के लिए संघर्ष किया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने “वेदों की ओर लौटो” का संदेश दिया, जबकि स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति और आत्मविश्वास का नया स्वर प्रस्तुत किया।
इसी काल में आधुनिक शिक्षा, रेल, डाक, तार और समाचार-पत्रों के प्रसार ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ा। भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना विकसित होने लगी।
1857 : स्वतंत्रता की पहली ज्वाला
अंग्रेजों की विस्तारवादी नीतियाँ, सैनिकों के साथ भेदभाव, किसानों का शोषण और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप की आशंकाओं ने पूरे देश में असंतोष फैला दिया। नई एनफील्ड राइफल के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी होने की चर्चा ने सैनिकों के रोष को विस्फोटक बना दिया।
29 मार्च 1857 को बैरकपुर में मंगल पांडे ने अंग्रेज अधिकारियों के विरुद्ध विद्रोह किया। यद्यपि उन्हें शीघ्र ही फाँसी दे दी गई, किंतु उनका बलिदान आने वाली क्रांति का प्रेरणास्रोत बन गया।
10 मई 1857 को मेरठ छावनी में सैनिकों ने विद्रोह कर दिल्ली की ओर कूच किया। दिल्ली पहुँचकर उन्होंने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र को भारत का सम्राट घोषित किया। शीघ्र ही यह संघर्ष उत्तर भारत के विशाल भूभाग में फैल गया।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अद्भुत वीरता का परिचय दिया। तात्या टोपे ने गुरिल्ला युद्ध से अंग्रेजों को लंबे समय तक चुनौती दी। कानपुर में नाना साहेब, अवध में बेगम हजरत महल, बिहार में वीर कुंवर सिंह तथा अनेक अन्य नेताओं ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया।
यद्यपि 1857 का संग्राम सफल नहीं हो सका, लेकिन इसने भारतीयों के मन में राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता की ऐसी चेतना उत्पन्न की जो आगे चलकर संगठित राष्ट्रीय आंदोलन का आधार बनी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
1857 के बाद भारतीयों ने यह अनुभव किया कि स्वतंत्रता के लिए संगठित राजनीतिक नेतृत्व आवश्यक है। इसी विचार के साथ 28 दिसंबर 1885 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। प्रारंभिक नेताओं—दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और बदरुद्दीन तैयबजी—ने भारतीयों के अधिकारों की आवाज़ बुलंद की।
दादाभाई नौरोजी ने अपने प्रसिद्ध धन-निकासी सिद्धांत के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि अंग्रेज भारत की संपत्ति को व्यवस्थित रूप से इंग्लैंड ले जा रहे हैं। उनके विचारों ने राष्ट्रीय चेतना को वैचारिक आधार प्रदान किया।
उग्र राष्ट्रवाद और स्वदेशी आंदोलन
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में स्वतंत्रता आंदोलन ने नई दिशा ग्रहण की। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल के नेतृत्व में उग्र राष्ट्रवाद का उदय हुआ। तिलक का उद्घोष—”स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा”—देशभर में स्वतंत्रता का मंत्र बन गया।
1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल का विभाजन किया गया। इसके विरोध में प्रारंभ हुआ स्वदेशी आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का पहला व्यापक जनआंदोलन बना। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया, स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन मिला और राष्ट्रीय शिक्षा के नए संस्थान स्थापित किए गए।
इसी काल में बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब में क्रांतिकारी संगठनों का गठन हुआ। खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी, विनायक दामोदर सावरकर और अनेक युवा क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल फूँक दिया।
प्रथम विश्व युद्ध और नई दिशा
1914 में प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ। लाखों भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सेना के साथ युद्ध में भाग लिया। भारतीयों को आशा थी कि युद्ध के बाद उन्हें अधिक अधिकार और स्वशासन मिलेगा, किंतु अंग्रेजी सरकार ने उनकी अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया। आर्थिक संकट, महँगाई और राजनीतिक असंतोष बढ़ने लगा।
इसी समय दक्षिण अफ्रीका से लौटे महात्मा गांधी भारतीय राजनीति में सक्रिय हुए। चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद के सफल आंदोलनों ने उन्हें राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित कर दिया। शीघ्र ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन एक नए युग में प्रवेश करने वाला था, जहाँ सत्य, अहिंसा और जनशक्ति अंग्रेजी साम्राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनने वाली थी। महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक ऐसा स्वरूप दिया जिसने इसे अभूतपूर्व जनसमर्थन प्रदान किया। उनका विश्वास था कि अन्याय का सामना सत्य, अहिंसा और आत्मबल के माध्यम से भी किया जा सकता है। गांधीजी का मानना था कि यदि पूरा राष्ट्र संगठित होकर शांतिपूर्ण ढंग से अन्याय का विरोध करे, तो सबसे शक्तिशाली साम्राज्य भी अधिक समय तक टिक नहीं सकता।
1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट लागू किया। इस कानून के तहत बिना मुकदमा चलाए किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर जेल में रखा जा सकता था। गांधीजी ने इसे “काला कानून” कहा और पूरे देश में सत्याग्रह का आह्वान किया। भारत के विभिन्न नगरों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए, किंतु अंग्रेज सरकार ने इनका कठोर दमन किया।
इसी दौरान 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में भारतीय इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक घटी। बैसाखी के अवसर पर हजारों लोग एक शांतिपूर्ण सभा में एकत्रित थे। तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने बिना किसी चेतावनी के निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया। संकरी गलियों से घिरे इस मैदान में लोग बाहर नहीं निकल सके और सैकड़ों लोग मारे गए, जबकि हजारों घायल हुए। इस नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर दिया और भारतीयों का ब्रिटिश शासन से बचा-खुचा विश्वास भी समाप्त हो गया।
जलियांवाला बाग की त्रासदी के बाद महात्मा गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला विशाल जनआंदोलन बना। गांधीजी ने लोगों से सरकारी विद्यालयों, महाविद्यालयों, अदालतों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का आह्वान किया। उन्होंने सरकारी उपाधियाँ लौटाने, खादी अपनाने और चरखा चलाने का संदेश दिया।
देशभर में लाखों विद्यार्थियों ने सरकारी शिक्षण संस्थान छोड़ दिए। अनेक प्रतिष्ठित वकीलों ने वकालत का त्याग कर दिया। विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक होलियाँ जलाई गईं। खादी राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक बन गई। पहली बार भारत के गाँवों तक स्वतंत्रता आंदोलन की पहुँच बनी और महिलाएँ भी बड़ी संख्या में आंदोलन से जुड़ने लगीं।
हालाँकि 4 फ़रवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें एक पुलिस थाने को आग लगा दी गई और कई पुलिसकर्मी मारे गए। गांधीजी का मानना था कि स्वतंत्रता का संघर्ष पूर्णतः अहिंसक होना चाहिए। इसलिए उन्होंने असहयोग आंदोलन को तत्काल वापस लेने का निर्णय लिया। इस निर्णय से कई नेता असहमत थे, किंतु गांधीजी ने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
आंदोलन स्थगित होने के बाद गांधीजी ने रचनात्मक कार्यक्रमों पर बल दिया। उन्होंने खादी, ग्रामोद्योग, स्वच्छता, अस्पृश्यता उन्मूलन, महिला शिक्षा और ग्राम विकास को राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनाया। उनका विश्वास था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब समाज भी आत्मनिर्भर और समतामूलक बनेगा।
इसी बीच क्रांतिकारी गतिविधियाँ भी तेज़ी से बढ़ रही थीं। युवा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजी शासन को सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से समाप्त करना चाहता था। दोनों धाराएँ—अहिंसक आंदोलन और क्रांतिकारी संघर्ष—अपने-अपने तरीके से स्वतंत्रता के लक्ष्य की ओर बढ़ रही थीं।
1927 में ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन नियुक्त किया, जिसमें एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था। पूरे देश में इसका जोरदार विरोध हुआ। “साइमन गो बैक” के नारे गूँज उठे। लाहौर में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु ने देश के युवाओं में गहरा आक्रोश पैदा किया।
दिसंबर 1929 में लाहौर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित किया। पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पारित इस ऐतिहासिक प्रस्ताव के बाद 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया गया और पूर्ण स्वतंत्रता की शपथ ली गई। यही तिथि आगे चलकर भारतीय गणतंत्र के लिए भी ऐतिहासिक बनी।
1930 में गांधीजी ने अंग्रेजों के अन्यायपूर्ण नमक कानून को चुनौती देने का निर्णय लिया। 12 मार्च 1930 को उन्होंने साबरमती आश्रम से 78 सत्याग्रहियों के साथ ऐतिहासिक दांडी यात्रा प्रारंभ की। लगभग 390 किलोमीटर की पदयात्रा के बाद 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचकर उन्होंने समुद्र तट से नमक उठाया और ब्रिटिश कानून का प्रतीकात्मक उल्लंघन किया।
नमक सत्याग्रह केवल नमक बनाने का आंदोलन नहीं था; यह ब्रिटिश शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों के विरुद्ध पूरे राष्ट्र की असहमति का प्रतीक बन गया। देशभर में लाखों लोगों ने नमक कानून तोड़ा। हजारों सत्याग्रहियों को गिरफ्तार किया गया, किंतु आंदोलन लगातार बढ़ता गया।
इसके साथ ही सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ हुआ। लोगों ने करों का बहिष्कार किया, विदेशी वस्तुओं का विरोध किया और अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन किया। इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक रही। सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, अरुणा आसफ़ अली और असंख्य महिलाओं ने सत्याग्रह का नेतृत्व किया।
1931 में गांधी-इरविन समझौते के बाद गांधीजी लंदन में आयोजित दूसरे गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए, लेकिन भारतीयों की अपेक्षाओं के अनुरूप कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। भारत लौटने पर आंदोलन फिर तेज हुआ और अंग्रेज सरकार ने पुनः व्यापक गिरफ्तारियाँ शुरू कर दीं।
1919 से 1935 के बीच का यह काल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का स्वर्णिम दौर माना जाता है। इसी समय स्वतंत्रता का संघर्ष शहरों से निकलकर गाँव-गाँव तक पहुँचा। किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों, महिलाओं और सामान्य नागरिकों ने राष्ट्रीय आंदोलन को अपनी शक्ति बना लिया। सत्य, अहिंसा और जनसंगठन के बल पर अंग्रेजी शासन की नैतिक नींव हिलने लगी थी।
लेकिन इसी काल में क्रांतिकारी आंदोलन भी नई ऊँचाइयों पर पहुँच चुका था। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और उनके साथियों का साहस भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका था। दूसरी ओर नेताजी सुभाषचंद्र बोस एक नए संघर्ष की तैयारी कर रहे थे। स्वतंत्रता का अंतिम और निर्णायक चरण अब निकट था। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में जहाँ एक ओर महात्मा गांधी के नेतृत्व में सत्याग्रह और अहिंसा की धारा प्रवाहित हो रही थी, वहीं दूसरी ओर अनेक युवा क्रांतिकारी यह मानते थे कि विदेशी शासन को केवल नैतिक अपील से नहीं, बल्कि साहसपूर्ण प्रतिरोध से भी चुनौती देना आवश्यक है। इन क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारतीय युवाओं में राष्ट्रभक्ति की ऐसी अलख जगाई, जो आज भी प्रेरणा का स्रोत है।
9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड ने अंग्रेजी शासन को झकझोर दिया। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को रोककर अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी। इस अभियान का नेतृत्व रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद तथा उनके साथियों ने किया। अंग्रेज सरकार ने कठोर कार्रवाई करते हुए बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी दे दी। उनका बलिदान स्वतंत्रता आंदोलन का अमर अध्याय बन गया।
इसी दौर में चंद्रशेखर आज़ाद भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के सबसे निर्भीक नेताओं के रूप में उभरे। उन्होंने संकल्प लिया था कि अंग्रेज उन्हें कभी जीवित नहीं पकड़ पाएँगे। 27 फ़रवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस से घिर जाने पर उन्होंने अंतिम गोली स्वयं पर चलाकर अपना वचन निभाया। उनका जीवन साहस, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम का अनुपम उदाहरण है।
भारतीय युवाओं के हृदय में सबसे गहरी छाप छोड़ने वाले क्रांतिकारी भगत सिंह थे। बचपन से ही देशभक्ति की भावना से प्रेरित भगत सिंह ने अपने साथियों सुखदेव और राजगुरु के साथ अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष का नया अध्याय लिखा। लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए उन्होंने अंग्रेज अधिकारी जे. पी. सॉन्डर्स की हत्या की।
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका। उनका उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था, बल्कि अपनी आवाज़ पूरे देश और विश्व तक पहुँचाना था। उन्होंने स्वयं गिरफ्तारी दी और अदालत को अपने विचारों का मंच बनाया। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर जेल में फाँसी दे दी गई। उनका अमर उद्घोष “इंकलाब ज़िंदाबाद” आज भी भारत की राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है।
उधर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर भी एक नए नेतृत्व का उदय हो रहा था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा और नई दिशा दी। वे मानते थे कि यदि आवश्यकता पड़े तो सशस्त्र संघर्ष भी स्वतंत्रता प्राप्ति का वैध माध्यम हो सकता है। उनका ऐतिहासिक आह्वान—”तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”—आज भी देशभक्ति का अमर मंत्र माना जाता है।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी ने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय युद्धबंदियों और प्रवासी भारतीयों की सहायता से आज़ाद हिंद फ़ौज (इंडियन नेशनल आर्मी) का पुनर्गठन किया। उन्होंने सिंगापुर में आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना की और “दिल्ली चलो” का नारा दिया। आज़ाद हिंद फ़ौज ने उत्तर-पूर्व भारत की दिशा में सैन्य अभियान चलाया। यद्यपि यह अभियान सैन्य दृष्टि से निर्णायक सफलता प्राप्त नहीं कर सका, लेकिन इसने भारतीय सैनिकों और जनता के मनोबल को नई ऊँचाई प्रदान की।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं का योगदान भी अत्यंत गौरवपूर्ण रहा। रानी लक्ष्मीबाई से लेकर बेगम हजरत महल, सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, अरुणा आसफ़ अली, उषा मेहता, सुचेता कृपलानी, विजयलक्ष्मी पंडित, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, दुर्गा भाभी और असंख्य महिलाओं ने नेतृत्व, संगठन, सत्याग्रह, भूमिगत आंदोलन तथा क्रांतिकारी गतिविधियों में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उनके साहस ने यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता संघर्ष केवल पुरुषों का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का आंदोलन था।
8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में महात्मा गांधी ने “करो या मरो” का ऐतिहासिक मंत्र दिया और भारत छोड़ो आंदोलन का शुभारंभ हुआ। अंग्रेज सरकार ने तुरंत गांधीजी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और लगभग सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन इस बार आंदोलन नेताओं के बिना भी नहीं रुका। देशभर में विद्यार्थी, किसान, महिलाएँ और युवा भूमिगत रहकर स्वतंत्रता की लड़ाई को आगे बढ़ाते रहे। अनेक स्थानों पर समानांतर प्रशासन स्थापित किए गए और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध व्यापक जनविद्रोह हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद आज़ाद हिंद फ़ौज के अधिकारियों पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमे चलाए गए। इन मुकदमों ने पूरे देश में अभूतपूर्व जनसमर्थन पैदा किया। भारतीय जनता ने स्पष्ट संदेश दिया कि स्वतंत्रता सेनानियों को अपराधी नहीं माना जा सकता।
फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी (नौसेना) विद्रोह ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। मुंबई से शुरू हुआ यह विद्रोह शीघ्र ही कराची, मद्रास, कोलकाता और अन्य नौसैनिक ठिकानों तक फैल गया। भारतीय नौसैनिकों के इस विद्रोह ने अंग्रेजों को यह एहसास करा दिया कि अब भारत पर बलपूर्वक शासन करना संभव नहीं रहा।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुका था। भारत में बढ़ते जनदबाव, भारत छोड़ो आंदोलन, आज़ाद हिंद फ़ौज के प्रभाव, नौसेना विद्रोह तथा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने ब्रिटिश सरकार को सत्ता हस्तांतरण के लिए विवश कर दिया।
अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की। आधी रात को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में अपना ऐतिहासिक भाषण दिया और स्वतंत्र भारत की नई यात्रा का शुभारंभ हुआ। देशभर में उत्सव का वातावरण था, किंतु इसी के साथ भारत का विभाजन भी हुआ। सांप्रदायिक हिंसा, बड़े पैमाने पर पलायन और लाखों लोगों की पीड़ा स्वतंत्रता के साथ जुड़ी सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी बन गई।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और समानता के मार्ग को अपनाया। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ और भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बना। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार, स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी दी। यह उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का मूर्त रूप था जिन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी जहाँ प्रत्येक नागरिक सम्मान और समान अवसर के साथ जीवन जी सके।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा का अमर स्रोत है। यह संघर्ष हमें सिखाता है कि राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक सद्भाव, सत्य, अहिंसा, साहस और त्याग के बल पर असंभव प्रतीत होने वाले लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं।
आज जब भारत विश्व की अग्रणी शक्तियों में अपना स्थान बना रहा है, तब हमारा यह दायित्व है कि हम स्वतंत्रता सेनानियों के आदर्शों को अपने जीवन में उतारें, संविधान का सम्मान करें, राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाएँ और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें। यही उन लाखों ज्ञात-अज्ञात वीरों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान देकर हमें स्वतंत्र भारत का अमूल्य उपहार दिया।
“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है।”
इसी अमर भावना ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन का आंदोलन बनाया और अंततः भारत को स्वतंत्रता का स्वर्णिम सूर्योदय देखने का सौभाग्य प्रदान किया। स्वतंत्रता का यह इतिहास केवल गौरव का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय के लिए कर्तव्य, चेतना और राष्ट्रसेवा का शाश्वत संदेश भी है।
