भारत का स्वतंत्रता आंदोलन : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, स्वदेशी आंदोलन और राष्ट्रीय जागरण

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, स्वदेशी आंदोलन और राष्ट्रीय जागरण (1885–1919)
संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दमन के बाद अंग्रेजी शासन ने यह समझ लिया था कि भारत पर शासन बनाए रखने के लिए केवल सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं होगी। दूसरी ओर भारतीय समाज भी यह अनुभव कर चुका था कि बिना संगठित राष्ट्रीय नेतृत्व के विदेशी शासन को समाप्त करना कठिन है। यही वह काल था जब आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद ने संगठित स्वरूप लेना प्रारंभ किया।
राष्ट्रीय चेतना का उदय
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आधुनिक शिक्षा, समाचार-पत्रों, रेल, डाक तथा तार व्यवस्था के विस्तार ने देश के विभिन्न भागों को एक-दूसरे के निकट ला दिया। शिक्षित भारतीयों ने यूरोप के लोकतांत्रिक विचारों, स्वतंत्रता, समानता और राष्ट्रवाद की अवधारणाओं का अध्ययन किया।
राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, महादेव गोविंद रानाडे और अन्य समाज सुधारकों ने भारतीय समाज में आत्मविश्वास और जागृति का वातावरण बनाया। साहित्य और पत्रकारिता ने भी राष्ट्रीय भावना को मजबूत किया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
28 दिसंबर 1885 को मुंबई (तत्कालीन बंबई) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। इसके प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता व्योमेश चंद्र बनर्जी ने की। प्रारंभिक उद्देश्य भारतीयों को एक साझा राजनीतिक मंच प्रदान करना और शासन में उनकी भागीदारी बढ़ाना था।
कांग्रेस के प्रारंभिक नेताओं में दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी प्रमुख थे। इन नेताओं ने संवैधानिक सुधारों, प्रशासनिक पारदर्शिता और भारतीयों के अधिकारों की मांग शांतिपूर्ण एवं वैधानिक तरीकों से की।
दादाभाई नौरोजी और ‘धन-निकासी सिद्धांत’
दादाभाई नौरोजी ने अपने प्रसिद्ध ‘ड्रेन थ्योरी’ (धन-निकासी सिद्धांत) के माध्यम से सिद्ध किया कि अंग्रेज भारत की संपत्ति को व्यवस्थित रूप से इंग्लैंड ले जा रहे हैं। उनके आर्थिक विश्लेषण ने भारतीयों को यह समझाया कि देश की गरीबी का एक बड़ा कारण औपनिवेशिक शोषण है।
गोपाल कृष्ण गोखले की भूमिका
गोपाल कृष्ण गोखले उदारवादी विचारधारा के प्रमुख नेता थे। उनका विश्वास संवैधानिक सुधारों, संवाद और शिक्षा में था। उन्होंने सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, सेवा और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विशेष बल दिया। महात्मा गांधी स्वयं उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।
उग्र राष्ट्रवाद का उदय
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय युवाओं में यह भावना प्रबल होने लगी कि केवल याचिकाओं और प्रार्थनाओं से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होगी। इस विचारधारा का नेतृत्व लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल ने किया। इन्हें इतिहास में ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से जाना जाता है।
लोकमान्य तिलक ने घोषणा की—
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”
यह उद्घोष पूरे भारत में स्वतंत्रता का मंत्र बन गया।
बंग-भंग और स्वदेशी आंदोलन
1905 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया। अंग्रेजों का उद्देश्य प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को आगे बढ़ाना था।
पूरे देश में इसका जबरदस्त विरोध हुआ। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग, राष्ट्रीय शिक्षा और आत्मनिर्भरता का अभियान शुरू हुआ। विद्यार्थियों, व्यापारियों, महिलाओं और युवाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन मिला। राष्ट्रीय विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना हुई। यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का पहला व्यापक जनआर्थिक आंदोलन बन गया।
क्रांतिकारी संगठनों का उदय
स्वदेशी आंदोलन के साथ-साथ अनेक युवाओं ने सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया। बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब में गुप्त क्रांतिकारी संगठनों की स्थापना हुई।
अनुशीलन समिति, युगांतर और अभिनव भारत जैसे संगठनों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संगठित क्रांतिकारी गतिविधियाँ प्रारंभ कीं। इन संगठनों का उद्देश्य युवाओं में राष्ट्रभक्ति जगाना और विदेशी शासन को चुनौती देना था।
खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी
1908 में युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने अंग्रेज अधिकारी किंग्सफोर्ड पर बम हमला किया। यद्यपि लक्ष्य चूक गया, लेकिन इस घटना ने पूरे देश में क्रांतिकारी आंदोलन को नई पहचान दी।
केवल 18 वर्ष की आयु में खुदीराम बोस हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ गए। उनका बलिदान भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया।
विनायक दामोदर सावरकर
विनायक दामोदर सावरकर ने क्रांतिकारी विचारधारा को वैचारिक आधार प्रदान किया। उन्होंने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष का समर्थन किया और अनेक युवाओं को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित किया। बाद में उन्हें सेल्युलर जेल (अंडमान) में कठोर कारावास का सामना करना पड़ा।
लाला लाजपत राय
‘पंजाब केसरी’ के नाम से प्रसिद्ध लाला लाजपत राय ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा दी। उन्होंने शिक्षा, स्वदेशी और राष्ट्रीय जागरण को आगे बढ़ाया। बाद के वर्षों में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान उन पर हुए लाठीचार्ज ने स्वतंत्रता आंदोलन को और तेज कर दिया।
प्रेस और साहित्य की भूमिका
भारतीय समाचार-पत्र स्वतंत्रता आंदोलन की रीढ़ बन गए। लोकमान्य तिलक के ‘केसरी’ और ‘मराठा’, गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’, तथा अनेक अन्य पत्र-पत्रिकाओं ने अंग्रेजी शासन की नीतियों की आलोचना करते हुए जनता में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का “वंदे मातरम्” राष्ट्रभक्ति का अमर गीत बन गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर, भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त और अन्य साहित्यकारों की रचनाओं ने जनमानस को प्रेरित किया।
प्रथम विश्व युद्ध और बदलती परिस्थितियाँ
1914 में प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ। लाखों भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सेना की ओर से युद्ध में भाग लिया। बदले में भारतीयों को राजनीतिक सुधारों और अधिक अधिकारों की आशा थी, लेकिन अंग्रेजी सरकार ने उनकी अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया।
युद्ध के बाद आर्थिक संकट, महँगाई और बेरोज़गारी बढ़ी। जनता का असंतोष फिर उभरने लगा। इसी समय दक्षिण अफ्रीका से लौटे महात्मा गांधी भारतीय राजनीति में तेजी से उभर रहे थे। उन्होंने सत्य, अहिंसा और जनसंगठन के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा देने की तैयारी शुरू कर दी थी।
1919 का वर्ष भारतीय इतिहास में निर्णायक सिद्ध हुआ। रॉलेट एक्ट, उसके विरोध में हुए आंदोलन और जलियांवाला बाग हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया। इसके बाद स्वतंत्रता आंदोलन एक नए चरण में प्रवेश करने वाला था, जिसमें महात्मा गांधी राष्ट्रीय नेतृत्व के केंद्र में आए।

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