भारत का स्वतंत्रता आंदोलन : महात्मा गांधी का नेतृत्व, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह
महात्मा गांधी का नेतृत्व, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह (1915–1935)
संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ने एक नया मोड़ लिया। इस दौर में एक ऐसे नेता का उदय हुआ जिसने सत्य, अहिंसा और जनशक्ति को संघर्ष का सबसे बड़ा हथियार बनाया। यह नेता थे महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें राष्ट्रपिता के रूप में सम्मान दिया जाता है। गांधीजी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन पहली बार गाँव-गाँव तक पहुँचा और करोड़ों भारतीयों का जनांदोलन बन गया।
दक्षिण अफ्रीका से भारत वापसी
महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। वहाँ उन्होंने रंगभेद और अन्याय के विरुद्ध सत्याग्रह का सफल प्रयोग किया था। भारत लौटने के बाद उन्होंने देश की परिस्थितियों का व्यापक अध्ययन किया और तत्काल किसी बड़े आंदोलन के बजाय जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझने का निर्णय लिया।
गोपाल कृष्ण गोखले के मार्गदर्शन में गांधीजी ने भारत भ्रमण किया और किसानों, मजदूरों तथा आम लोगों की कठिनाइयों को निकट से देखा।
चंपारण सत्याग्रह : गांधीजी का पहला बड़ा आंदोलन
1917 में बिहार के चंपारण जिले में अंग्रेज नील किसानों का शोषण कर रहे थे। गांधीजी ने किसानों के आग्रह पर वहाँ सत्याग्रह किया। शांतिपूर्ण आंदोलन के कारण अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा और किसानों को राहत मिली।
यह गांधीजी की भारत में पहली बड़ी राजनीतिक सफलता थी। इससे देशभर में उनका प्रभाव बढ़ा।
खेड़ा सत्याग्रह और अहमदाबाद मिल आंदोलन
1918 में गुजरात के खेड़ा जिले में फसल खराब होने के बावजूद किसानों से लगान वसूला जा रहा था। गांधीजी ने किसानों के समर्थन में आंदोलन चलाया और सरकार को कर वसूली स्थगित करनी पड़ी।
इसी वर्ष अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों के वेतन विवाद में भी गांधीजी ने सफल मध्यस्थता की। इन आंदोलनों ने यह सिद्ध कर दिया कि अहिंसक संघर्ष भी प्रभावी हो सकता है।
रॉलेट एक्ट और देशव्यापी विरोध
1919 में अंग्रेज सरकार ने रॉलेट एक्ट पारित किया। इस कानून के अंतर्गत बिना मुकदमा चलाए किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता था। पूरे देश में इसका विरोध हुआ। गांधीजी ने इसे अन्यायपूर्ण कानून बताते हुए सत्याग्रह का आह्वान किया।
जलियांवाला बाग हत्याकांड
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों लोग शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्रित हुए थे। तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने बिना चेतावनी दिए निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं।
सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। यह घटना अंग्रेजी शासन की क्रूरता का प्रतीक बन गई। पूरे देश में आक्रोश फैल गया और भारतीयों का ब्रिटिश शासन से विश्वास पूरी तरह उठ गया।
असहयोग आंदोलन (1920–1922)
जलियांवाला बाग की त्रासदी और खिलाफत आंदोलन के समर्थन के साथ गांधीजी ने 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया।
इस आंदोलन के अंतर्गत जनता से अपील की गई कि—
सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों का बहिष्कार करें।
सरकारी नौकरियों और उपाधियों का त्याग करें।
विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करें।
स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करें।
चरखा चलाकर खादी अपनाएँ।
देशभर में लाखों लोगों ने इस आंदोलन में भाग लिया। विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लिया, वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया और विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक होलियाँ जलाई गईं।
चौरी-चौरा घटना
4 फ़रवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई। उग्र भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें कई पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई।
गांधीजी का मानना था कि स्वतंत्रता का संघर्ष पूरी तरह अहिंसक होना चाहिए। इसलिए उन्होंने असहयोग आंदोलन को तत्काल स्थगित कर दिया। इस निर्णय की कई नेताओं ने आलोचना भी की, लेकिन गांधीजी अपने नैतिक सिद्धांतों पर अडिग रहे।
रचनात्मक कार्यक्रम
आंदोलन स्थगित होने के बाद गांधीजी ने समाज सुधार पर बल दिया। उन्होंने—
खादी और ग्रामोद्योग को बढ़ावा दिया।
अस्पृश्यता उन्मूलन का अभियान चलाया।
महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित किया।
शिक्षा और स्वावलंबन पर जोर दिया।
स्वच्छता और ग्राम विकास को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा।
साइमन कमीशन का विरोध
1928 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के संवैधानिक सुधारों की समीक्षा के लिए साइमन कमीशन भेजा। इस आयोग में कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था।
पूरे देश में “साइमन गो बैक” के नारे गूँज उठे। लाहौर में विरोध प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु ने क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा दी।
पूर्ण स्वराज्य का संकल्प
दिसंबर 1929 में लाहौर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित किया। पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में यह ऐतिहासिक निर्णय लिया गया।
26 जनवरी 1930 को पूरे देश में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया गया और पूर्ण स्वतंत्रता की शपथ ली गई। बाद में स्वतंत्र भारत का संविधान भी 26 जनवरी को लागू किया गया, जिससे यह तिथि गणतंत्र दिवस के रूप में अमर हो गई।
दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह
1930 में गांधीजी ने अंग्रेजों के नमक कानून को चुनौती देने का निर्णय लिया। 12 मार्च 1930 को उन्होंने साबरमती आश्रम से 78 साथियों के साथ पैदल यात्रा प्रारंभ की।
लगभग 390 किलोमीटर की यात्रा के बाद 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचकर गांधीजी ने समुद्र तट से नमक उठाकर अंग्रेजी कानून का उल्लंघन किया।
यह घटना केवल नमक बनाने का विरोध नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के अन्यायपूर्ण कानूनों को खुली चुनौती थी। पूरे देश में लाखों लोगों ने नमक कानून तोड़ा और हजारों गिरफ्तारियाँ हुईं।
सविनय अवज्ञा आंदोलन
नमक सत्याग्रह के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन पूरे भारत में फैल गया। लोगों ने करों का विरोध किया, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और सरकारी कानूनों की अहिंसक अवज्ञा की।
महिलाओं ने पहली बार बड़े पैमाने पर आंदोलन में भाग लिया। सरोजिनी नायडू, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, कस्तूरबा गांधी और अनेक महिला नेताओं ने आंदोलन को नई शक्ति प्रदान की।
गांधी-इरविन समझौता
1931 में गांधीजी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच समझौता हुआ। इसके बाद गांधीजी लंदन में आयोजित दूसरे गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए, लेकिन सम्मेलन से भारतीयों की अपेक्षाएँ पूरी नहीं हो सकीं।
भारत लौटने पर आंदोलन पुनः प्रारंभ हुआ और अंग्रेजों ने गांधीजी सहित अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।
गांधी युग का महत्व
1915 से 1935 का काल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में निर्णायक सिद्ध हुआ। इस अवधि में—
स्वतंत्रता आंदोलन गाँव-गाँव तक पहुँचा।
महिलाओं, किसानों, मजदूरों और विद्यार्थियों की व्यापक भागीदारी हुई।
खादी और स्वदेशी राष्ट्रीय पहचान बने।
सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह ने विश्व राजनीति को नई दिशा दी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक जनसंगठन के रूप में स्थापित हुई।
यद्यपि स्वतंत्रता अभी दूर थी, लेकिन अब अंग्रेजी शासन की नैतिक और राजनीतिक नींव कमजोर पड़ चुकी थी। इसी काल में समानांतर रूप से क्रांतिकारी आंदोलन भी तेज हो रहा था। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और उनके साथियों ने अपने साहस और बलिदान से युवाओं में स्वतंत्रता की नई चेतना का संचार किया।
