अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी की निर्णायक हुंकार
संदीप गोयल / एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वर्ष 1942 एक ऐसे निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज है, जब देश की जनता ने अंग्रेजी हुकूमत को स्पष्ट संदेश दिया कि अब भारत पर विदेशी शासन स्वीकार नहीं किया जाएगा। महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुआ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों की स्वतंत्रता की आकांक्षा का विस्फोट था।
8 अगस्त 1942 को बंबई (अब मुंबई) के गोवालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने भारत छोड़ो प्रस्ताव स्वीकार किया। इसी अवसर पर महात्मा गांधी ने देशवासियों को ‘करो या मरो’ का आह्वान किया। अगले ही दिन, 9 अगस्त को गांधीजी सहित कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। नेतृत्व को जेल में डालकर ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने की कोशिश की, लेकिन इसके विपरीत आंदोलन देशभर में और अधिक फैल गया।
गिरफ्तारी के बाद जनता ने संभाली आंदोलन की कमान
गांधीजी और कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन का कोई केंद्रीकृत नेतृत्व नहीं रहा। इसके बावजूद विद्यार्थी, किसान, मजदूर, महिलाएं और आम नागरिक अपने-अपने क्षेत्रों में आंदोलन का नेतृत्व करने लगे। कई स्थानों पर हड़तालें हुईं, जुलूस निकले और ब्रिटिश शासन के प्रतीकों का विरोध किया गया।
उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र और अन्य क्षेत्रों में आंदोलन का प्रभाव विशेष रूप से दिखाई दिया। बलिया, सतारा और मिदनापुर जैसे क्षेत्रों में तो कुछ समय के लिए समानांतर प्रशासन की कोशिशें भी हुईं।
बलिया से बिहार तक अंग्रेजी दमन
आंदोलन के प्रसार से घबराई ब्रिटिश सरकार ने व्यापक दमन शुरू कर दिया। अनेक स्थानों पर पुलिस और सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई। बलिया सहित कई क्षेत्रों में सरकारी प्रतिष्ठानों और संचार व्यवस्था को निशाना बनाया गया। कुछ स्थानों पर भीड़ और सरकारी बलों के बीच हिंसक टकराव भी हुए।
ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 9 अगस्त से दिसंबर 1942 के बीच पुलिस और सेना ने 538 बार गोली चलाई, जिसमें 940 लोग मारे गए और 1,630 घायल हुए। इसी अवधि में 60,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में गिरफ्तारियों की संख्या 60,229 बताई गई है।
हालांकि इन आंकड़ों को अंतिम और पूर्ण संख्या नहीं माना जा सकता। सरकारी आंकड़े मुख्यतः प्रशासनिक अभिलेखों पर आधारित थे और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े स्रोतों में इससे कहीं अधिक जनहानि के अनुमान मिलते हैं। इसलिए मृत्यु के आंकड़े प्रस्तुत करते समय सरकारी आंकड़ों और गैर-सरकारी अनुमानों के बीच अंतर स्पष्ट करना आवश्यक है।
रेलवे, डाक और संचार व्यवस्था भी बनी संघर्ष का मैदान
भारत छोड़ो आंदोलन का प्रभाव केवल सभाओं और जुलूसों तक सीमित नहीं रहा। अनेक स्थानों पर ब्रिटिश प्रशासन की संचार और परिवहन व्यवस्था को बाधित किया गया। रेलवे स्टेशन, डाकघर, तारघर और टेलीफोन लाइनें आंदोलनकारियों के निशाने पर आईं।
ऐतिहासिक अध्ययनों में लगभग 250 रेलवे स्टेशनों के क्षतिग्रस्त या नष्ट होने का उल्लेख मिलता है। अनेक डाकघरों और पुलिस थानों पर भी हमले हुए तथा तार और संचार लाइनों को काटे जाने की घटनाएं सामने आईं। हालांकि अलग-अलग प्रांतों और स्रोतों में इन घटनाओं की संख्या अलग-अलग मिलती है।
यह भी उल्लेखनीय है कि संयुक्त प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश) में ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार 104 रेलवे स्टेशन और लगभग 250 अन्य सरकारी भवन नष्ट या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए थे। इससे आंदोलन की व्यापकता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सरकारी दमन के बावजूद नहीं टूटा जनता का हौसला
ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए गिरफ्तारियां, गोलीबारी, सामूहिक दंड और अन्य कठोर उपाय अपनाए। कांग्रेस कार्यालयों को बंद किया गया, नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया तथा आंदोलन से जुड़े प्रकाशनों पर प्रतिबंध लगाए गए।
लेकिन दमन के बावजूद भूमिगत गतिविधियां जारी रहीं। जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, अरुणा आसफ अली, उषा मेहता और अनेक अन्य कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुप्त रेडियो प्रसारण, पर्चों और संदेशों के माध्यम से जनता तक आंदोलन की आवाज पहुंचाई जाती रही।
हिंसा और अहिंसा के बीच जटिल दौर
भारत छोड़ो आंदोलन का मूल आह्वान गांधीजी के नेतृत्व में अहिंसक जनसंघर्ष का था। लेकिन शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद अनेक स्थानों पर आंदोलन स्वतःस्फूर्त और उग्र हो गया। रेलवे लाइनों, तार व्यवस्था और सरकारी भवनों पर हमले तथा आगजनी जैसी घटनाएं भी हुईं। दूसरी ओर, ब्रिटिश प्रशासन ने इन घटनाओं को आंदोलन के दमन के औचित्य के रूप में इस्तेमाल किया।
इसलिए 1942 के आंदोलन को समझते समय उसके दो पक्षों को अलग-अलग देखना जरूरी है—एक ओर गांधीजी का अहिंसक ‘करो या मरो’ का संदेश था, तो दूसरी ओर नेतृत्व की सामूहिक गिरफ्तारी के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में उभरा स्वतःस्फूर्त और कई जगह हिंसक जनविद्रोह।
अंग्रेजों के लिए स्पष्ट संदेश
भारत छोड़ो आंदोलन तत्काल स्वतंत्रता दिलाने में सफल नहीं हुआ। ब्रिटिश सरकार ने सैन्य और प्रशासनिक शक्ति के बल पर आंदोलन को दबा दिया। लेकिन इसके बाद भारत में ब्रिटिश शासन की वैधता और स्थायित्व को गहरा राजनीतिक आघात पहुंचा।
आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की जनता अब औपनिवेशिक शासन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। स्वतंत्रता की मांग किसी सीमित राजनीतिक वर्ग की मांग नहीं रह गई थी, बल्कि वह व्यापक जनभावना बन चुकी थी। भारत सरकार के प्रकाशनों ने भी भारत छोड़ो आंदोलन को स्वतंत्रता संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना है।
9 अगस्त 1942 की वह पुकार आज भी इतिहास में गूंजती है
भारत छोड़ो आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को निर्णायक जनआंदोलन का स्वरूप दिया। हजारों लोगों ने जेल यात्राएं कीं, अनेक ने प्राणों का बलिदान दिया और असंख्य परिवारों ने दमन सहा। सरकारी आंकड़े चाहे 940 मृतकों और 1,630 घायलों की बात करें, जबकि अन्य स्रोत कहीं अधिक जनहानि का अनुमान देते हों—इतिहास का निर्विवाद सत्य यह है कि 1942 में भारतीय जनता ने स्वतंत्रता के लिए असाधारण कीमत चुकाई।
‘करो या मरो’ की वह पुकार अंततः भारत की स्वतंत्रता की दिशा में अंतिम बड़े जनसंघर्षों में से एक बनी। 1942 ने अंग्रेजी शासन को यह अहसास करा दिया कि भारत को अनिश्चितकाल तक गुलाम बनाए रखना संभव नहीं होगा।
इसीलिए भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, जनप्रतिरोध, त्याग और स्वतंत्रता की अडिग आकांक्षा का ऐतिहासिक प्रतीक बन गया।
