संदीप गोयल/एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस

देहरादून 6 फरवरी। आज राजधानी देहरादून मे आयोजित सभा को सम्बोधित करते बस्ती बचाओ आन्दोलन देहरादून उत्तराखण्ड के संयोजक अनन्त आकाश ने कहा की बस्ती बचाओ आंदोलन के डेढ़ लाख हस्ताक्षरों के बाद 9 अक्टूबर को मुख्य सचिव उत्तराखण्ङ की अध्यक्षता वाली बैठक मे बस्तियों के मालिकाना हक का फैसला लिया गया था। तथा बस्ती बचाओ आन्दोलन ने मांग की थी कि बिना भेदभाव किये सभी बस्तियों को मालिकाना हक ‌दिया जाये किन्तु मुख्य सचिव के आदेशों के बावजूद भी जिला प्रशासन एवं नगर निगम द्वारा मालिकाना हक का मामला ठण्डे बस्ते में डाल दिया है, ताकि पूर्व की भांति भाजपा सरकार 2027 के विधानसभा चुनाव में मालिकाना हक के नाम पर बस्तियों से वोट बटोर सके। चुनाव जितने के बाद दिल्ली, विहार, यूपी, हरियाणा आदि राज्यों की तरह ही बस्तियों को उजाड़ने का कार्य कर सके। पिछले निकाय चुनाव में मुख्य मंत्री धामी की घोषणा के बावजूद भी देहरादून अनेकों स्थान पर बस्तियों को उजाडा़ गया। जनता की असहमति व विरोध के बावजूद भी एलिबेटेड को मंजूरी देकर हजारों परिवारों को बेघर-बार करने का फैसला लिया गया। वहीं नगर निगम देहरादून द्वारा अकेले बिन्दाल क्षेत्र में पड़ने वाले 872 घरों तोड़ने के लिऐ चुना गया।

बस्ती बचाओ आन्दोलन देहरादून उत्तराखण्ड के संयोजक अनन्त आकाश ने कहा की आज अकेले देहरादून नगर निगम की 60 प्रतिशत आबादी इन्ही बस्तियों में रह रही है, जहाँ न केवल देहरादून बल्कि हमारे राज्य का मेहनत कश वर्ग चाहे वह चालक, राजमित्री हो या फिर द्याडी़ मजदूर या फिर बिजली, पानी का कार्य करने वाले हो, इन्ही बस्तियों से आते हैं। घरों का काम करने वाली कामकाजी महिलाएं तथा सब्जी, रेहड़ी, पटरी व्यवसाय जिनके बना जीवन संचालित होना सम्भव नहीं है। आबादी का यह बड़ा हिस्सा बड़े कष्टों मे जीवन यापन करने के बावजूद अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा है। बस्ती बचाओ आन्दोलन द्वारा हाईकोर्ट नैनीताल में एलिवेटेड रोड़ तथा नगर निगम, एमडीडीए द्वारा 872 मकानों को तोड़ने के खिलाफ जनहित याचिका दायर की है। जनसुनवाई में प्रभावितों के विरोध के बावजूद जिलाधिकारी देहरादून की ओर एलिवेटेड रोड़ भूमि अधिग्रहण हेतु समाचार पत्रों के माध्यम से सार्वजनिक विज्ञप्ति जारी की जा चुकी है। जिसमें बताया गया है कि 2800 प्रभावितों में से मात्र 372 कानून सम्मत मुआवजे एवं पुर्नवास के हकदार हैं, जो कि अन्य प्रभावितों के साथ भारी अन्याय है। जबकि कानूनन वे सभी प्रभावित बाजार भाव से मुआवजे तथा समुचित पुर्नवास तथा सभी सुविधाओं के हकदार हैं। एलिवेटेड रोड़ पर नौकरशाही बिना पार्षदों की सलाह लिये मनमाना फैसला लिया जा रहा है। उत्तराखण्ड में भूमि अधिग्रहण के दौरान कब्जाधारियों के अधिकारों के संबंध में ‘भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013’ (RFCTLARR Act, 2013) लागू होता है। इसके साथ ही, राज्य सरकार की अपनी पुनर्वास नीतियां भी हैं।

मुख्य कानूनी प्रावधान और कब्जाधारियों के अधिकार:- पात्रता (Eligibility) : कानून के तहत, केवल भूमि के मालिक (Title holder) ही नहीं, बल्कि तीन साल या उससे अधिक समय से उस भूमि पर निर्भर या कब्जा जमाए हुए परिवार (जिनमें खेतिहर मजदूर, किराएदार, या बटाईदार शामिल हैं) भी ‘प्रभावित परिवार’ की श्रेणी में आते हैं, यदि सरकारी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहित की जाती है, सभी कब्जाधारियों को भी पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन (R&R) का लाभ मिल सकता है, यदि वे साबित कर सकें कि वे वर्षों से उस स्थान पर बसे हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार, उन्हें हटाया जा सकता है। हालाँकि, रिहायशी मकानों पर तत्काल कार्रवाई से राहत मिल सकती है।

बस्ती बचाओ आन्दोलन देहरादून उत्तराखण्ड के संयोजक अनन्त आकाश ने कहा की 12 फरवरी को होने वाले राज्य सचिवालय पर आयोजित प्रदर्शन के माध्यम से मांग की जायगी की जनविरोधी एलिवेटेड रोड़ परियोजना निरस्त करो, सभी बस्तीवासियों को मालिकाना हक दो एव छूटे हुऐ आपदा पीड़ितों को समुचित सहायता दो, आगामी वर्षा से पूर्व रिस्पना बिन्दाल के दोनों तरफ बाढ से सुरक्षा की व्यवस्था करो।

 

 

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