सेन्टर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स ने उत्तराखण्ड न्यूनतम वेतन अधिसूचना को छलावा बताया
एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस की उत्तराखंड राज्य कमेटी ने उत्तराखण्ड राज्य सरकार द्वारा 29 अप्रैल 2026 को अधिसूचित न्यूनतम वेतन को एक छलावा बताते हुए खारिज कर दिया है, और मांग की है कि न्यूनतम वेतन 26,000 रुपये से कम नहीं होना चाहिए। उत्तराखण्ड सरकार की न्यूनतम वेतन अधिसूचना, जिसमें इंजीनियरिंग उद्योगों में ‘अनुसूचित रोजगार’ के लिए 1.4.2026 से प्रभावी न्यूनतम वेतन अकुशल श्रमिकों के लिए 13,800 रुपये, अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए 15,000 रुपये और कुशल श्रमिकों के लिए 16,900 रुपये निर्धारित किया गया है-पूरी तरह से एकतरफा है, और इसका कोई वैज्ञानिक आधार या उचित वैधानिक प्रक्रिया नहीं है। अधिसूचना में दावा किया गया है कि यह ‘त्रिपक्षीय समिति’ की सिफारिशों पर आधारित है। समिति का यह दावा कि प्रस्तावित वेतन कर्मचारियों के प्रतिनिधियों के साथ परामर्श पर आधारित है-पूरी तरह से एक ढोंग है; क्योंकि किसी भी केंद्रीय ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधियों व आंदोलित श्रमिकों के प्रतिनिधियों के साथ ऐसा कोई परामर्श नहीं किया गया था। इसके अलावा, समिति का गठन स्वयं 17.4.2026 को किया गया था, जिसमें 2 नियोक्ता प्रतिनिधियों के साथ 2 श्रमिक प्रतिनिधियों को शामिल किया गया था। लेकिन इन श्रमिक और नियोक्ता प्रतिनिधियों का विवरण न तो आम जनता को पता है और न ही सामान्य रूप से श्रमिकों को। न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 के तहत यह अनिवार्य है कि धारा 7 के अंतर्गत एक त्रिपक्षीय ‘राज्य न्यूनतम वेतन सलाहकार बोर्ड’ का गठन किया जाए; और धारा 5(1)(ए) के अंतर्गत एक विशिष्ट त्रिपक्षीय समिति का गठन किया जाए-जिसमें समान प्रतिनिधित्व हो-ताकि उत्तराखण्ड में इंजीनियरिंग उद्योग के सभी रोजगारों के लिए एक समान न्यूनतम वेतन निर्धारित किया जा सके; अथवा धारा 5(1)(बी) के अंतर्गत प्रत्येक ‘अनुसूची’ के लिए अलग-अलग समितियां गठित की जाएं, लेकिन इस प्रक्रिया में इन वैधानिक प्रावधानों में से किसी का भी पालन नहीं किया गया; क्योंकि नवंबर 2000 में राज्य के गठन के बाद से अब तक ‘राज्य न्यूनतम वेतन सलाहकार बोर्ड’ का गठन ही नहीं किया गया है। परिणामस्वरूप, पिछले 25 वर्षों से न्यूनतम वेतन में बिल्कुल भी संशोधन नहीं किया गया है, जबकि कानून के अनुसार हर 5 वर्ष में कम से कम एक बार इसमें संशोधन किया जाना अनिवार्य है। नोटिफिकेशन में यह दावा किया गया है कि ‘कोड ऑन वेजेस 2019’ लागू कर दिया गया है, लेकिन यह दावा राज्य सरकार को ‘न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948’ को दरकिनार करके न्यूनतम वेतन तय करने का अधिकार नहीं देता है, जब तक कि इस कोड के तहत नियम बनाकर राज्य में अधिसूचित न कर दिए जाएं। ‘औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947’ की धारा 3(ख) की आड़ लेकर जारी किया गया यह न्यूनतम वेतन नोटिफिकेशन, असल में मालिकों को खुश करने और मज़दूरों को उनके कानूनी अधिकार-यानी समय पर संशोधित होने वाले अनिवार्य न्यूनतम वेतन-से वंचित करने के लिए किया गया है; क्योंकि पिछले 20 सालों से न्यूनतम वेतन में कोई संशोधन नहीं हुआ था। यदि कानून के अनुसार न्यूनतम वेतन में नियमित रूप से संशोधन किया गया होता, तो अब तक केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की 26,000 रुपये की मांग पूरी हो चुकी होती। यह नोटिफिकेशन न केवल ‘न्यूनतम वेतन अधिनियम’ का उल्लंघन करता है, बल्कि ज़रूरी चीज़ों की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण जीवन-यापन की बढ़ती लागत को भी इसमें नज़रअंदाज़ किया गया है। कानूनी न्यूनतम वेतन का निर्धारण,15वें ‘भारतीय श्रम सम्मेलन’ में बनी आम सहमति और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के ‘रैप्टाकोस फैसले’ के आधार पर किया जाना चाहिए। लेकिन, मौजूदा नोटिफिकेशन में इन सभी बातों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करते हुए, एकतरफा और अवैज्ञानिक तरीके से बेहद कम न्यूनतम वेतन तय किया गया है, जो मज़दूरों को किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। सेन्टर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स इस अधिसूचित न्यूनतम वेतन को पूरी तरह से खारिज करता है, और मज़दूरों से भी इसे पूरी तरह से खारिज करने का आह्वान करता है। साथ ही, सेन्टर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स ज़ोरदार मांग करता है कि ‘न्यूनतम वेतन अधिनियम’ की धारा 7 के तहत तत्काल ‘राज्य न्यूनतम वेतन सलाहकार बोर्ड’ का गठन किया जाए; धारा 5(1)(ए) के तहत एक समिति बनाई जाए; और कानूनी प्रावधानों के अनुसार, वैज्ञानिक आधार पर राज्य-स्तरीय एक समान न्यूनतम वेतन निर्धारित किया जाए।
