निर्वाचन आयोग को पत्र लिख कर कांग्रेस पार्टी ने दर्ज कराई आपत्ति
एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून 6 अक्टूबर। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री गणेश गोदियाल ने पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान प्रपत्र-7 के माध्यम से मतदाताओं के नाम हटाए जाने तथा ऐसे हटाए गए नामों को पुनः सम्मिलित करने के लिए प्रपत्र-6 प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर निर्वाचन आयोग को पत्र लिख कर कांग्रेस पार्टी की ओर से आपत्ति दर्ज की है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी उत्तराखंड को लिखे पत्र में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री गणेश गोदियाल ने कहा है कि जनवरी, 2026 से 29 मई, 2026 की अवधि के दौरान उत्तराखंड में एक पूर्व-एस.आई.आर. प्रक्रिया संचालित की गई, जिसमें डी ड्यूप्लकैशन सॉफ्टवेयर के आधार पर एक जैसी प्रविष्टियों तथा जनसांख्यिकीय विवरण और फोटो के आधार पर समान प्रविष्टियों की पहचान करने और मतदाताओं को अनुपस्थित, मृत, स्थानांतरित, लापता अथवा अन्यथा नाम विलोपन के लिए योग्य मानने हेतु दोहराव-पहचान सॉफ्टवेयर तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रियाओं का उपयोग किया गया। इस प्रक्रिया में मई 2026 से पहले 453459 मतदाताओं के नाम काटे गए। इन सभी में फॉर्म 7 स्वतः सर्जित हुए और आपत्तिकर्ता के रूप में स्वयं सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी/निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी का पदनाम अंकित किया गया है ।
इसके पश्चात दावे एवं आपत्तियों के चरण से पहले 14 जुलाई 2026 को प्रारूप निर्वाचक नामावली प्रकाशित की गई । जिसमें लगभग 71 लाख 33 हजार मतदाताओं के नाम थे , जिनमें से 24,30,387 व्यक्तियों को विसंगति/तार्किक असंगति की श्रेणी में दर्शाया गया। जिसमें ऐसे व्यक्ति भी सम्मिलित थे जिनके अभिलेखों का 2003 की मतदाता सूची से मिलान नहीं हो पाया था । इसके बाद ऐसे व्यक्तियों को अपनी पात्रता सिद्ध करने तथा आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए नोटिस जारी किए गए । मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा प्रकट की गई जानकारी के अनुसार, जिन मतदाताओं के अभिलेखों जमा न होने के कारण 97,186 मतदाताओं के भी प्रपत्र 7 स्वतः सर्जित हो गए थे । इन मामलों में आपत्ति स्वयं सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी/ निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी द्वारा किए जाने का उल्लेख किया गया, जिसका मुख्य आधार यह था कि संबंधित व्यक्तियों द्वारा अपेक्षित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए और इस कारण वे अपात्र हो गए। ऐसी आपत्तियों के आधार पर संक्षिप्त कार्यवाही की गई और तत्पश्चात ऐसे मतदाताओं के नाम निर्वाचक नामावली से हटा दिए गए।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि इस संबंध में आपत्ति केवल किसी व्यक्ति के नाम को सही अथवा गलत तरीके से हटाए जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वयं उस प्रक्रिया की वैधानिकता पर है जिसके माध्यम से ये नाम हटाए गए। निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के नियम 13(2) में यह प्रावधान है कि विद्यमान निर्वाचक नामावली में किसी नाम के सम्मिलित किए जाने के विरुद्ध आपत्ति अथवा किसी नाम को हटाए जाने का आवेदन प्रपत्र-7 में किया जाएगा तथा ऐसी आपत्ति उस व्यक्ति द्वारा की जाएगी जिसका नाम उक्त निर्वाचक नामावली में सम्मिलित है। इस प्रकार नियम द्वारा निर्धारित व्यवस्था में संबंधित निर्वाचक नामावली में नाम रखने वाले व्यक्ति को आपत्ति करने का अधिकार दिया गया है और केवल इस आधार पर कि संबंधित मतदाता ने दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी, सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी अथवा अन्य निर्वाचन अधिकारी स्वयं आपत्तिकर्ता बनकर प्रपत्र-7 तैयार या प्रस्तुत नहीं कर सकते। निर्वाचन अधिकारी का प्रत्येक कार्य अधिनियम एवं नियमों के अनुरूप होना आवश्यक है और कोई भी पुस्तिका, मार्गदर्शिका, सॉफ्टवेयर द्वारा उत्पन्न प्रक्रिया अथवा प्रशासनिक निर्देश उन्हीं के अनुरूप ही लागू किया जा सकता है। जहां नियम यह निर्धारित करते हैं कि आपत्ति कौन कर सकता है, वहां किसी प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा उस श्रेणी का विस्तार करके किसी नए प्रकार का आपत्तिकर्ता नहीं बनाया जा सकता है । अतः यदि उपर्युक्त 97,186 मामलों में प्रपत्र-7 की आपत्तियां स्वयं निर्वाचन अधिकारियों द्वारा उत्पन्न अथवा प्रस्तुत की गई थीं, तो ऐसी आपत्तियों के आधार पर किए गए नाम विलोपन की संपूर्ण प्रक्रिया की तत्काल पुनः समीक्षा किया जाना आवश्यक है।
श्री गणेश गोदियाल ने कहा कि निर्वाचन आयोग का यह तथ्य कि उक्त मामलों में संक्षिप्त कार्यवाही की गई, इस विषय को और गंभीर बनाता है। दावे एवं आपत्तियों के चरण के दौरान किसी व्यक्ति द्वारा किसी विशेष दस्तावेज को प्रस्तुत न कर पाना अपने-आप में निर्वाचन अधिकारी को प्रपत्र-7 के अंतर्गत आपत्तिकर्ता नहीं बना सकता, जबकि नियम स्पष्ट रूप से यह निर्धारित करते हैं कि ऐसी आपत्ति कौन प्रस्तुत कर सकता है। अतः प्रश्न यह नहीं है कि किसी व्यक्ति का नाम सही अथवा गलत तरीके से हटाया गया, बल्कि यह है कि नाम हटाने की कार्यवाही प्रारंभ करने के लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया अथवा नहीं। यदि नाम विलोपन का आधार ऐसी आपत्ति थी जिसे संबंधित व्यक्ति अथवा अधिकारी द्वारा विधि के अनुसार प्रस्तुत ही नहीं किया जा सकता था, तो उसके आधार पर बाद में की गई संक्षिप्त कार्यवाही उस मूल विधिक त्रुटि को समाप्त नहीं कर सकती। अतः ऐसी प्रक्रिया के आधार पर हटाए गए सभी नामों की तत्काल समीक्षा कर उन्हें विधि के अनुसार पुनः सम्मिलित किया जाना आवश्यक है और इसका संपूर्ण भार प्रभावित मतदाता पर डालकर उसे पुनः नए सिरे से नामांकन की प्रक्रिया में भेजना उचित नहीं है।
यह विषय वर्तमान में और अधिक गंभीर हो गया है क्योंकि जिन व्यक्तियों के नाम उपर्युक्त प्रक्रिया के माध्यम से निर्वाचक नामावली से हटा दिए गए हैं, उनसे अब पुनः नाम सम्मिलित कराने के लिए प्रपत्र-6 प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जा रही है। ऐसे व्यक्ति नए मतदाता नहीं हैं और उनके आवेदन पहली बार नामांकन के आवेदन नहीं हैं। वे पहले से निर्वाचक नामावली में सम्मिलित मतदाता थे, जिनके नाम बाद में निर्वाचन तंत्र द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया के माध्यम से हटा दिए गए। ऐसे व्यक्ति से प्रपत्र-6 में यह घोषणा करवाना कि “मैं पहली बार निर्वाचक नामावली में नाम सम्मिलित किए जाने के लिए आवेदन कर रहा/रही हूँ और मेरा नाम किसी भी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र/संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में सम्मिलित नहीं है”, तथ्यात्मक और विधिक रूप से उचित नहीं है। इससे ऐसे व्यक्तियों पर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के अन्तर्गत दण्डनीय परिणाम भी लागू होने की आशंका उत्पन्न होती है, जबकि उनके पूर्व नामांकन का सत्यापन स्वयं निर्वाचन अभिलेखों से किया जा सकता है। जिस व्यक्ति का नाम स्वयं निर्वाचन अधिकारियों द्वारा निर्वाचक नामावली से हटाया गया हो, उससे केवल उस नाम को पुनः सम्मिलित कराने के लिए यह घोषणा करना उचित रूप से अपेक्षित नहीं किया जा सकता कि वह पहली बार आवेदन कर रहा है।
श्री गणेश गोदियाल ने निर्वाचन आयोग से मांग की है कि प्रपत्र-7 के माध्यम से किए गए ऐसे नाम विलोपन की संपूर्ण प्रक्रिया की वैधानिकता की प्रक्रिया-स्तर पर जांच की जाए; उन मामलों में सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों/निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों अथवा अन्य निर्वाचन अधिकारियों को आपत्तिकर्ता बनने तथा प्रपत्र-7 उत्पन्न अथवा प्रारंभ करने की अनुमति किस विधिक प्रावधान अथवा आदेश के अंतर्गत दी गई, उसका स्पष्ट आधार सार्वजनिक किया जाए; तथा ऐसी प्रक्रिया के आधार पर किए गए सभी नाम विलोपन, विशेष रूप से अभिलेखों का मिलान न होने वाले व्यक्तियों को जारी किए गए 97,186 प्रपत्र-7 नोटिसों से संबंधित मामले, तत्काल पुनः जांचे जाएं और जहां नाम ऐसी अवैध प्रक्रिया के आधार पर हटाया गया हो, वहां उन्हें पुनः निर्वाचक नामावली में सम्मिलित किया जाए। जिन व्यक्तियों के नाम इस प्रक्रिया के माध्यम से हटाए गए हैं, उनके लिए उनके पूर्व निर्वाचक अभिलेखों के आधार पर पुनः सम्मिलन की पृथक एवं सरल व्यवस्था की जाए और उन्हें पहली बार मतदाता होने संबंधी घोषणा के साथ प्रपत्र-6 भरने के लिए बाध्य न किया जाए। वैधानिक नियमों को किसी भी विपरीत पुस्तिका, सॉफ्टवेयर आधारित प्रक्रिया अथवा प्रशासनिक निर्देश पर प्राथमिकता दी जाए तथा किसी पात्र मतदाता को ऐसी निर्वाचन प्रक्रिया के कारण निर्वाचक नामावली में बने रहने के अधिकार से वंचित न किया जाए जो स्वयं वैधानिक आवश्यकताओं के अनुरूप न हो।
